Couplets Poetry (page 10)
बुतान-ए-हिन्द मिरे दिल में हैं दर आए हुए
ज़ेबा
आप को खो के तुम को ढूँढ लिया
ज़ेबा
'ज़ेब' मुझे डर लगने लगा है अपने ख़्वाबों से
ज़ेब ग़ौरी
'ज़ेब' अब ज़द में जो आ जाए वो दिल हो कि निगाह
ज़ेब ग़ौरी
ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला
ज़ेब ग़ौरी
ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं दिल तुझ को कौन सँभालेगा
ज़ेब ग़ौरी
ये कम है क्या कि मिरे पास बैठा रहता है
ज़ेब ग़ौरी
ये डूबती हुई क्या शय है तेरी आँखों में
ज़ेब ग़ौरी
वो मेरे सामने ख़ंजर-ब-कफ़ खड़ा था 'ज़ेब'
ज़ेब ग़ौरी
उस की राहों में पड़ा मैं भी हूँ कब से लेकिन
ज़ेब ग़ौरी
उलट रही थीं हवाएँ वरक़ वरक़ उस का
ज़ेब ग़ौरी
उड़ा के ख़ाक बहुत मैं ने देख ली ऐ 'ज़ेब'
ज़ेब ग़ौरी
टूटती रहती है कच्चे धागे सी नींद
ज़ेब ग़ौरी
तूफ़ाँ में नाव आई तो क्या सम्त क्या निशाँ
ज़ेब ग़ौरी
थक गया एक कहानी सुनते सुनते मैं
ज़ेब ग़ौरी
तेरे सामने आते हुए घबराता हूँ
ज़ेब ग़ौरी
तलाश एक बहाना था ख़ाक उड़ाने का
ज़ेब ग़ौरी
सूरज ने इक नज़र मिरे ज़ख़्मों पे डाल के
ज़ेब ग़ौरी
शेर तो मुझ से तेरी आँखें कहला लेती हैं
ज़ेब ग़ौरी
शायद अब भी कोई शरर बाक़ी हो 'ज़ेब'
ज़ेब ग़ौरी
संग-ए-बेहिस से उठी मौज-ए-सियह-ताब कोई
ज़ेब ग़ौरी
फिर एक नक़्श का नैरंग 'ज़ेब' बिखरेगा
ज़ेब ग़ौरी
न जाने क्या है कि जब भी मैं उस को देखता हूँ
ज़ेब ग़ौरी
मुझ से बिछड़ कर होगा समुंदर भी बेचैन
ज़ेब ग़ौरी
मिरी जगह कोई आईना रख लिया होता
ज़ेब ग़ौरी
मैं ने देखा था सहारे के लिए चारों तरफ़
ज़ेब ग़ौरी
मैं ने बेताबाना बढ़ कर दश्त में आवाज़ दी
ज़ेब ग़ौरी
मैं तो चाक पे कूज़ा-गर के हाथ की मिट्टी हूँ
ज़ेब ग़ौरी
मैं तिश्ना था मुझे सर-चश्मा-ए-सराब दिया
ज़ेब ग़ौरी
मैं पयम्बर तिरा नहीं लेकिन
ज़ेब ग़ौरी