Couplets Poetry (page 9)

औरत के ख़ुदा दो हैं हक़ीक़ी ओ मजाज़ी

ज़ेहरा निगाह

अपना हर अंदाज़ आँखों को तर-ओ-ताज़ा लगा

ज़ेहरा निगाह

अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है

ज़ेहरा निगाह

अब भी कुछ लोग सुनाते हैं सुनाए हुए शेर

ज़ेहरा निगाह

वो दास्तान मुकम्मल करे तो अच्छा है

ज़ीशान साहिल

मैं ज़िंदगी के सभी ग़म भुलाए बैठा हूँ

ज़ीशान साहिल

कोई आ के हमें ढूँडेगा तो खो जाएगा

ज़ीशान साहिल

कितने हैं लोग ख़ुद को जो खो कर उदास हैं

ज़ीशान साहिल

किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को

ज़ीशान साहिल

खिड़की के रस्ते से लाया करता हूँ

ज़ीशान साहिल

जो वो नहीं था तो मैं मुत्तफ़िक़ था लोगों से

ज़ीशान साहिल

जो हमें पा के भी खोने से बहुत पीछे था

ज़ीशान साहिल

गुज़र गई है मगर रोज़ याद आती है

ज़ीशान साहिल

बस एक रंग है दिल में किसी के होने से

ज़ीशान साहिल

अब तो ये शायद किसी भी काम आ सकता नहीं

ज़ीशान साहिल

आया था मेरे पास वो कुछ देर के लिए

ज़ीशान साहिल

रौशनी में तिरी रफ़्तार से करता हूँ सफ़र

ज़ीशान अतहर

ऐसे तय्यार हुआ बैठा हूँ

ज़ीशान अतहर

ये ज़िंदगी है अपनी कभी ख़ुश कभी उदास

ज़ेबुन्निसा ज़ेबी

ज़ाहिद मुझे न माने-ए-शर्ब-ए-शराब हो

ज़ेबा

ये बात बात पे ज़ाहिद जो टूट जाता है

ज़ेबा

पहले क्या था जो किया करते थे तारीफ़ मिरी

ज़ेबा

नहीं है फ़ुर्सत यहीं के झगड़ों से फ़िक्र-ए-उक़्बा कहाँ की वाइ'ज़

ज़ेबा

मुझे क्यूँ आज हिचकी आ रही है

ज़ेबा

क्यूँकर करूँ मैं तर्क शराब-ओ-कबाब को

ज़ेबा

किसी महबूब-ए-गंदुम-गूँ की उल्फ़त में गुज़रते हैं

ज़ेबा

ख़ुदा की भी नहीं सुनते हैं ये बुत

ज़ेबा

जिस्म-ए-अनवर की लताफ़त की सना क्या कीजे

ज़ेबा

हुआ है इश्क़ में कम हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक़ ऐसा

ज़ेबा

हँस के फूलों को वो करेंगे सुबुक

ज़ेबा