Couplets Poetry (page 7)
मुश्किलें दिल में नई शमएँ जला देती हैं
ज़िया जालंधरी
मैं आफ़्ताब को कैसे दिखाऊँ तारीकी
ज़िया जालंधरी
कैसे दुख कितनी चाह से देखा
ज़िया जालंधरी
इज़हार ना-रसा सही वो सूरत-ए-जमाल
ज़िया जालंधरी
इतना सोचा तुझे कि दुनिया को
ज़िया जालंधरी
इश्क़ में भी कोई अंजाम हुआ करता है
ज़िया जालंधरी
हिम्मत है तो बुलंद कर आवाज़ का अलम
ज़िया जालंधरी
हाँ मुझ पे सितम भी हैं बहुत वक़्त के लेकिन
ज़िया जालंधरी
देख फूलों से लदे धूप नहाए हुए पेड़
ज़िया जालंधरी
बुरा न मान 'ज़िया' उस की साफ़-गोई का
ज़िया जालंधरी
अन-कही बात के सौ रूप कही बात का एक
ज़िया जालंधरी
अब्र-ए-आवारा से मुझ को है वफ़ा की उम्मीद
ज़िया जालंधरी
अब ये आँखें किसी तस्कीन से ताबिंदा नहीं
ज़िया जालंधरी
अब जो रूठे तो जाँ पे बनती है
ज़िया जालंधरी
अब इस का चारा ही क्या कि अपनी तलब ही ला-इंतिहा थी वर्ना
ज़िया जालंधरी
उजालों को ढूँडो सहर को पुकारो
ज़िया फ़तेहाबादी
ज़मीं पर गिर रहे थे चाँद तारे जल्दी जल्दी
ज़ेहरा निगाह
ये उदासी ये फैलते साए
ज़ेहरा निगाह
वो साथ न देता तो वो दाद न देता तो
ज़ेहरा निगाह
वो न जाने क्या समझा ज़िक्र मौसमों का था
ज़ेहरा निगाह
वहशत में भी मिन्नत-कश-ए-सहरा नहीं होते
ज़ेहरा निगाह
उठो कि जश्न-ए-ख़िज़ाँ हम मनाएँ जी भर के
ज़ेहरा निगाह
तुम से हासिल हुआ इक गहरे समुंदर का सुकूत
ज़ेहरा निगाह
तारों को गर्दिशें मिलीं ज़र्रों को ताबिशें
ज़ेहरा निगाह
सुल्ह जिस से रही मेरी ता-ज़िंदगी
ज़ेहरा निगाह
शाम ढले आहट की किरनें फूटी थीं
ज़ेहरा निगाह
शब-भर का तिरा जागना अच्छा नहीं 'ज़ेहरा'
ज़ेहरा निगाह
साअतें जो तिरी क़ुर्बत में गिराँ गुज़री थीं
ज़ेहरा निगाह
रुक जा हुजूम-ए-गुल कि अभी हौसला नहीं
ज़ेहरा निगाह
रौशनियाँ अतराफ़ में 'ज़ेहरा' रौशन थीं
ज़ेहरा निगाह