Couplets Poetry (page 6)

मुख़्तसर बात-चीत अच्छी है

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

मेरी तज्वीज़ पर ख़फ़ा क्यूँ हो

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

जुनूँ शोला-सामाँ ख़िरद शबनम-अफ़्शाँ

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

जब तक कि मोहब्बत का चलन आम रहेगा

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

इतने नादिम न होइए आख़िर

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

इसी तरह बातें किए जाइए

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

हम से वाइज़ ने बात की होती

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

हमें भी ज़रूरत थी इक शख़्स की

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

गोश-ए-मुश्ताक़-ए-सदा-ए-नाला-ए-दिल अब कहाँ

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

गो उन्हें राह-ए-इंहिराफ़ नहीं

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

फ़िक्र-मंदी फ़ुज़ूल होती है

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

दीवाना-ए-जुस्तुजू हो गया चाँद

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

अक़्ल कुछ ज़ीस्त की कफ़ील नहीं

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

आरिज़ से तिरे सुब्ह की तोहमत न उठेगी

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

आप के साथ मुस्कुराने में

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

उस को जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

ज़िया ज़मीर

कुछ ज़ुल्म ओ सितम सहने की आदत भी है हम को

ज़िया ज़मीर

कैसी ताबीर की हसरत कि 'ज़िया' बरसों से

ज़िया ज़मीर

दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ

ज़िया ज़मीर

'ज़िया' वो ज़िंदगी क्या ज़िंदगी है

ज़िया जालंधरी

ये आँसू ये पशेमानी का इज़हार

ज़िया जालंधरी

वो शाख़ बने-सँवरे वो शाख़ फले-फूले

ज़िया जालंधरी

वो ख़्वाब क्या था कि जिस की हयात है ताबीर

ज़िया जालंधरी

वक़्त बे-मेहर है इस फ़ुर्सत-ए-कमयाब में तुम

ज़िया जालंधरी

उन्हें अपने गुदाज़-ए-दिल से अंदाज़ा था औरों का

ज़िया जालंधरी

उन कही बात के सौ रूप कही बात का एक

ज़िया जालंधरी

तू कोई सूखा हुआ पत्ता नहीं है कि जिसे

ज़िया जालंधरी

तेरे दुख को पा कर हम तो अपना दुख भी भूल गए

ज़िया जालंधरी

तेरा ग़म भी न हो तो क्या जीना

ज़िया जालंधरी

रंग बातें करें और बातों से ख़ुश्बू आए

ज़िया जालंधरी