Couplets Poetry (page 5)

आज तो दिल के दर्द पर हँस कर

ज़ुबैर अली ताबिश

आइना कब बनाओगे मुझ को

ज़ुबैर अली ताबिश

यूँ तो दिए फ़रेब सहारों ने उम्र भर

ज़ोहरा नसीम

बार-ए-ग़म-ए-जहाँ भी है तेरा ख़याल भी

ज़ोहरा नसीम

हर्फ़-ओ-बयाँ, नज़ारे, सितारे, दिल ओ नज़र

ज़ियाउल हसन

यूँ तो मुसहफ़ भी उठाए गए क़समें भी मगर

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

तुझ को छुआ तो देर तक ख़ुद को ही ढूँडता रहा

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

तू किसी सुब्ह सी आँगन में उतर आती है

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

थोड़ी सी बारिश होती है

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

तिरी ख़्वाहिश किसी इम्काँ की सूरत

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

तिरे ग़याब को मौजूद में बदलते हुए

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

समझ पाया नहीं पर सुन रहा हूँ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

क़तरा क़तरा छत से ही रिसने लगी

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

मेरे गिर्या से न आज़ार उठाने से हुआ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

मैं जागते में कहीं बन रहा हूँ अज़-सर-ए-नौ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

किवाड़ खुलने से पहले ही दिन निकल आया

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

किसी सफ़र किसी अस्बाब से इलाक़ा नहीं

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

जब बच्चों को देखता हूँ तो सोचता हूँ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

हम अपने आप से भी हम-सुख़न न होते थे

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

हर एक साज़ को साज़िंदगाँ नहीं दरकार

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

अब्र से और धूप से रिश्ता है एक सा मिरा

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

आवाज़ों में बहते बहते

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

वो भरी बज़्म में कहती है मुझे अंकल-जी

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

सर-ए-बज़्म मुझ को उठा दिया मुझे मार मार लिटा दिया

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

मुझे अपनी बीवी पे फ़ख़्र है मुझे अपने साले पे नाज़ है

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

मिरे रोब में तो वो आ गया मिरे सामने तो वो झुक गया

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

मैं जिसे हीर समझता था वो राँझा निकला

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

यक़ीं गर करो तुम बहुत ख़ूब है

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

पास-ए-पिंदार-ए-तबीअत दिल अगर रख ले तो क्या

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

पड़ती नहीं है दिल पे तिरे हुस्न की किरन

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब