Couplets Poetry (page 8)
रात अजब आसेब-ज़दा सा मौसम था
ज़ेहरा निगाह
नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तुजू भी नहीं
ज़ेहरा निगाह
मैं तो अपने आप को उस दिन बहुत अच्छी लगी
ज़ेहरा निगाह
मय-ए-हयात में शामिल है तल्ख़ी-ए-दौराँ
ज़ेहरा निगाह
लो डूबतों ने देख लिया नाख़ुदा को आज
ज़ेहरा निगाह
कोई हंगामा सर-ए-बज़्म उठाया जाए
ज़ेहरा निगाह
कहाँ के इश्क़-ओ-मोहब्बत किधर के हिज्र ओ विसाल
ज़ेहरा निगाह
जो सुन सको तो ये सब दास्ताँ तुम्हारी है
ज़ेहरा निगाह
जो दिल ने कही लब पे कहाँ आई है देखो
ज़ेहरा निगाह
जीना है तो जी लेंगे बहर-तौर दिवाने
ज़ेहरा निगाह
जिन बातों को सुनना तक बार-ए-ख़ातिर था
ज़ेहरा निगाह
इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
ज़ेहरा निगाह
इस शहर को रास आई हम जैसों की गुम-नामी
ज़ेहरा निगाह
हम से बढ़ी मसाफ़त-ए-दश्त-ए-वफ़ा कि हम
ज़ेहरा निगाह
हम जो पहुँचे तो रहगुज़र ही न थी
ज़ेहरा निगाह
ग़म अपने ही अश्कों का ख़रीदा हुआ है
ज़ेहरा निगाह
गर्दिश-ए-मीना-ओ-जाम देखिए कब तक रहे
ज़ेहरा निगाह
एक तेरा ग़म जिस को राह-ए-मो'तबर जानें
ज़ेहरा निगाह
एक के घर की ख़िदमत की और एक के दिल से मोहब्बत की
ज़ेहरा निगाह
दीवानों को अब वुसअत-ए-सहरा नहीं दरकार
ज़ेहरा निगाह
दिल बुझने लगा आतिश-ए-रुख़्सार के होते
ज़ेहरा निगाह
देर तक रौशनी रही कल रात
ज़ेहरा निगाह
देखते देखते इक घर के रहने वाले
ज़ेहरा निगाह
देखो वो भी हैं जो सब कह सकते थे
ज़ेहरा निगाह
देखो तो लगता है जैसे देखा था
ज़ेहरा निगाह
छोटी सी बात पे ख़ुश होना मुझे आता था
ज़ेहरा निगाह
भूलना ख़ुद को तो आसाँ है भुला बैठा हूँ
ज़ेहरा निगाह
बस्ती में कुछ लोग निराले अब भी हैं
ज़ेहरा निगाह
बरसों हुए तुम कहीं नहीं हो
ज़ेहरा निगाह
बहुत दिन ब'अद 'ज़ेहरा' तू ने कुछ ग़ज़लें तो लिख्खीं
ज़ेहरा निगाह