Couplets Poetry (page 11)

मैं लाख इसे ताज़ा रखूँ दिल के लहू से

ज़ेब ग़ौरी

महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ोशे गुलों के छूट गिरे

ज़ेब ग़ौरी

लहू में तैरता फिरता है मेरा ख़स्ता बदन

ज़ेब ग़ौरी

कुछ दूर तक तो चमकी थी मेरे लहू की धार

ज़ेब ग़ौरी

कोई ख़बर ही न थी मर्ग-ए-जुस्तुजू की मुझे

ज़ेब ग़ौरी

किस ने सहरा में मिरे वास्ते रक्खी है ये छाँव

ज़ेब ग़ौरी

खुली छतों से चाँदनी रातें कतरा जाएँगी

ज़ेब ग़ौरी

कम रौशन इक ख़्वाब आईना इक पीला मुरझाया फूल

ज़ेब ग़ौरी

कहीं पता न लगा फिर वजूद का मेरे

ज़ेब ग़ौरी

जितना देखो उसे थकती नहीं आँखें वर्ना

ज़ेब ग़ौरी

जगमगाता हुआ ख़ंजर मिरे सीने में उतार

ज़ेब ग़ौरी

जाग के मेरे साथ समुंदर रातें करता है

ज़ेब ग़ौरी

घसीटते हुए ख़ुद को फिरोगे 'ज़ेब' कहाँ

ज़ेब ग़ौरी

एक किरन बस रौशनियों में शरीक नहीं होती

ज़ेब ग़ौरी

एक झोंका हवा का आया 'ज़ेब'

ज़ेब ग़ौरी

दिल को सँभाले हँसता बोलता रहता हूँ लेकिन

ज़ेब ग़ौरी

दिल है कि तिरी याद से ख़ाली नहीं रहता

ज़ेब ग़ौरी

ढूँढती फिरती हैं जाने मिरी नज़रें किस को

ज़ेब ग़ौरी

धो के तू मेरा लहू अपने हुनर को न छुपा

ज़ेब ग़ौरी

देख कभी आ कर ये ला-महदूद फ़ज़ा

ज़ेब ग़ौरी

छेड़ कर जैसे गुज़र जाती है दोशीज़ा हवा

ज़ेब ग़ौरी

चमक रहा है ख़ेमा-ए-रौशन दूर सितारे सा

ज़ेब ग़ौरी

बे-हिसी पर मिरी वो ख़ुश था कि पत्थर ही तो है

ज़ेब ग़ौरी

बड़े अज़ाब में हूँ मुझ को जान भी है अज़ीज़

ज़ेब ग़ौरी

और भी गहरी हो जाती है उस की सरगोशी

ज़ेब ग़ौरी

अंदर अंदर खोखले हो जाते हैं घर

ज़ेब ग़ौरी

अधूरी छोड़ के तस्वीर मर गया वो 'ज़ेब'

ज़ेब ग़ौरी

अब तक तो किसी ग़ैर का एहसाँ नहीं मुझ पर

ज़ेब ग़ौरी

अब मुझ से ये दुनिया मिरा सर माँग रही है

ज़ेब ग़ौरी

आगे चल के तो कड़े कोस हैं तन्हाई के

ज़ेब ग़ौरी