Couplets Poetry (page 13)

तिरी जवान उमंगों को हो गया है क्या

ज़की काकोरवी

शिकवा नहीं दुनिया के सनम-हा-ए-गिराँ का

ज़की काकोरवी

साफ़ कहिए कि प्यार करते हैं

ज़की काकोरवी

रुमूज़-ए-इश्क़ की गहराइयाँ सलामत हैं

ज़की काकोरवी

मुझ को सुकूँ की चैन की पज़मुर्दगी से क्या

ज़की काकोरवी

मरने के बअ'द कोई पशेमाँ हुआ तो क्या

ज़की काकोरवी

मंज़िल जिसे समझते थे यारान-ए-क़ाफ़िला

ज़की काकोरवी

मैं ने तन्हाइयों के लम्हों में

ज़की काकोरवी

लोग कहते रहे क़रीब है वो

ज़की काकोरवी

कितने ही फूल चुन लिए मैं ने

ज़की काकोरवी

कारवाँ तो निकल गया कोसों

ज़की काकोरवी

जुनूँ के कैफ़-ओ-कम से आगही तुझ को नहीं नासेह

ज़की काकोरवी

हुस्न जिस हाल में नज़र आया

ज़की काकोरवी

दूसरों को फ़रेब दे दे कर

ज़की काकोरवी

दर्द-ए-दिल ने ली न थी करवट अभी

ज़की काकोरवी

बुरी तक़दीर के रोने से हासिल

ज़की काकोरवी

अक़्ल ने तर्क-ए-तअल्लुक़ को ग़नीमत जाना

ज़की काकोरवी

अहल-ए-दिल ने किए तामीर हक़ीक़त के सुतूँ

ज़की काकोरवी

पुरवाइयों से लड़ती हैं पच्छिम की आँधियाँ

ज़काउद्दीन शायाँ

ज़माने हो गए हैं चलते चलते

ज़करिय़ा शाज़

ये मोहब्बत है इसे देख तमाशा न बना

ज़करिय़ा शाज़

ये कैसे मोड़ पर मैं आ गया हूँ

ज़करिय़ा शाज़

ये अलग बात कि चलते रहे सब से आगे

ज़करिय़ा शाज़

उस से आगे जाओगे तब जानेंगे

ज़करिय़ा शाज़

उन को भी उतारा है बड़े शौक़ से हम ने

ज़करिय़ा शाज़

तअल्लुक़ ही नहीं है जिन से मेरा

ज़करिय़ा शाज़

सिर्फ़ हम ही तो नहीं टूटे हैं

ज़करिय़ा शाज़

'शाज़' ख़ुद में ही गँवाए हुए ख़ुद को रखना

ज़करिय़ा शाज़

फाँदनी पड़ गई काँटों से भरी बाड़ हमें

ज़करिय़ा शाज़

मैं चुप रहा तो आँख से आँसू उबल पड़े

ज़करिय़ा शाज़