Couplets Poetry (page 14)
कुछ भी देखा नहीं था मैं ने जब
ज़करिय़ा शाज़
किस क़यामत की घुटन तारी है
ज़करिय़ा शाज़
खिड़की तो 'शाज़' बंद मैं करता हूँ बार बार
ज़करिय़ा शाज़
कैसे कह दूँ बीच अपने दीवार है जब
ज़करिय़ा शाज़
जब भी घर के अंदर देखने लगता हूँ
ज़करिय़ा शाज़
जाने क्या बात है पूरे ही नहीं होते हैं
ज़करिय़ा शाज़
एक मुद्दत मैं ख़मोशी से रहा महव-ए-कलाम
ज़करिय़ा शाज़
इक जैसे हैं दुख सुख सब के इक जैसी उम्मीदें
ज़करिय़ा शाज़
दुख न सहने की सज़ाओं में घिरा रहता है
ज़करिय़ा शाज़
छोड़ आया हूँ पीछे सब आवाज़ों को
ज़करिय़ा शाज़
अपने ही बस पीछे भागता रहता हूँ
ज़करिय़ा शाज़
ऐ गर्दिश-ए-अय्याम हमें रंज बहुत है
ज़करिय़ा शाज़
आख़िर ये नाकाम मोहब्बत काम आई
ज़करिय़ा शाज़
दिल की लगी दिल वाला जाने
ज़का सिद्दीक़ी
वो पर्दा-नशीनी की रिआयत है तुम्हारी
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
तुम्हारी रह का रहा हम को हर तरफ़ धोका
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
तुम अपनी ज़ुल्फ़ से पूछो मिरी परेशानी
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
तेरे कहने से में अब लाऊँ कहाँ से नासेह
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
सौंप कर ख़ाना-ए-दिल ग़म को किधर जाते हो
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
रात भर ख़ून-ए-जिगर हम ने किया है 'आरिफ़'
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
पानी निकल के दश्त में जारी है जा-ब-जा
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
न आए सामने मेरे अगर नहीं आता
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
लाए जब घर से तो बेहोश पड़ा था 'आरिफ़'
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
खोया ग़म-ए-रिफ़ाक़त देखो कमाल अपना
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
कर दिया तीरों से छलनी मुझे सारा लेकिन
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
हूँ तिश्ना-काम-ए-दश्त-ए-शहादत ज़ि-बस कि मैं
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
गुलशन-ए-ख़ुल्द में हर-चंद कि दिल बहलाया
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
फ़ुर्क़त में कार-ए-वस्ल लिया वाह वाह से
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
दम का आना तो बड़ी बात है लब पर 'आरिफ़'
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
बीच में है मेरे उस के तू ही ऐ आह-ए-हज़ीं
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़