Couplets Poetry (page 317)
मारा किसी ने संग तो ठोकर लगी मुझे
इक़बाल साजिद
मैं तिरे दर का भिकारी तू मिरे दर का फ़क़ीर
इक़बाल साजिद
मैं ख़ून बहा कर भी हुआ बाग़ में रुस्वा
इक़बाल साजिद
मैं आईना बनूँगा तू पत्थर उठाएगा
इक़बाल साजिद
कट गया जिस्म मगर साए तो महफ़ूज़ रहे
इक़बाल साजिद
जैसे हर चेहरे की आँखें सर के पीछे आ लगीं
इक़बाल साजिद
इन्दर थी जितनी आग वो ठंडी न हो सकी
इक़बाल साजिद
होते ही शाम जलने लगा याद का अलाव
इक़बाल साजिद
ग़ुर्बत की तेज़ आग पे अक्सर पकाई भूक
इक़बाल साजिद
फ़िक्र-ए-मेआर-ए-सुख़न बाइस-ए-आज़ार हुई
इक़बाल साजिद
एक भी ख़्वाहिश के हाथों में न मेहंदी लग सकी
इक़बाल साजिद
दरवेश नज़र आता था हर हाल में लेकिन
इक़बाल साजिद
बगूला बन के समुंदर में ख़ाक उड़ाना थी
इक़बाल साजिद
बढ़ गया है इस क़दर अब सुर्ख़-रू होने का शौक़
इक़बाल साजिद
अपनी अना की आज भी तस्कीन हम ने की
इक़बाल साजिद
अब तू दरवाज़े से अपने नाम की तख़्ती उतार
इक़बाल साजिद
मिरे लबों का तबस्सुम तो सब ने देख लिया
इक़बाल सफ़ी पूरी
कोई समझाए कि क्या रंग है मयख़ाने का
इक़बाल सफ़ी पूरी
कौन जाने कि इक तबस्सुम से
इक़बाल सफ़ी पूरी
चश्म-ए-साक़ी मुझे हर गाम पे याद आती है
इक़बाल सफ़ी पूरी
रात भर कोई न दरवाज़ा खुला
इक़बाल नवेद
फेंक दे बाहर की जानिब अपने अंदर की घुटन
इक़बाल नवेद
मिरी ख़्वाहिश है दुनिया को भी अपने साथ ले आऊँ
इक़बाल नवेद
ख़्वाहिशों के पेड़ से गिरते हुए पत्ते न चुन
इक़बाल नवेद
ख़ुदा जाने गिरेबाँ किस के हैं और हाथ किस के हैं
इक़बाल नवेद
अब इतनी ज़ोर से हर घर पे दस्तकें देना
इक़बाल नवेद
सरहद-ए-जाँ तलक क़लम-रौ दिल
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
रोता है कोई किसी के ग़म में
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
मैं नहीं मिलता किसी से
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
जब साया भी शीशे की तरह टूट गया
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी