Couplets Poetry (page 319)
मिरे जुर्म-ए-वफ़ा का फ़ैसला कुछ इस तरह होगा
इक़बाल अज़ीम
कुछ ऐसे ज़ख़्म भी दर-पर्दा हम ने खाए हैं
इक़बाल अज़ीम
जुनूँ को होश कहाँ एहतिमाम-ए-ग़ारत का
इक़बाल अज़ीम
जिस में न कोई रंग न आहंग न ख़ुशबू
इक़बाल अज़ीम
झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर
इक़बाल अज़ीम
जब घर की आग बुझी तो कुछ सामान बचा था जलने से
इक़बाल अज़ीम
इस जश्न-ए-चराग़ाँ से तो बेहतर थे अँधेरे
इक़बाल अज़ीम
हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते
इक़बाल अज़ीम
हाथ फैलाऊँ मैं ईसा-नफ़सों के आगे
इक़बाल अज़ीम
बे-नियाज़ाना गुज़र जाए गुज़रने वाला
इक़बाल अज़ीम
बारहा उन से न मिलने की क़सम खाता हूँ मैं
इक़बाल अज़ीम
अपनी मिट्टी ही पे चलने का सलीक़ा सीखो
इक़बाल अज़ीम
ऐ अहल-ए-वफ़ा दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
इक़बाल अज़ीम
अब हम भी सोचते हैं कि बाज़ार गर्म है
इक़बाल अज़ीम
आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब
इक़बाल अज़ीम
ख़ुद को जब भूल से जाते हैं तो यूँ लगता है
इक़बाल अशहर कुरेशी
जो लोग लौट के ख़ुद मेरे पास आए हैं
इक़बाल अशहर कुरेशी
दरख़्त हाथ हिलाते थे रहनुमाई को
इक़बाल अशहर कुरेशी
वो किसी को याद कर के मुस्कुराया था उधर
इक़बाल अशहर
वैसे भी उस से कोई रब्त न रक्खा मैं ने
इक़बाल अशहर
वही तो मरकज़ी किरदार है कहानी का
इक़बाल अशहर
ठहरी ठहरी सी तबीअत में रवानी आई
इक़बाल अशहर
तेरी बातों को छुपाना नहीं आता मुझ से
इक़बाल अशहर
तेरे किरदार को इतना तो शरफ़ हासिल है
इक़बाल अशहर
सुनो समुंदर की शोख़ लहरो हवाएँ ठहरी हैं तुम भी ठहरो
इक़बाल अशहर
सोचता हूँ तिरी तस्वीर दिखा दूँ उस को
इक़बाल अशहर
सताया आज मुनासिब जगह पे बारिश ने
इक़बाल अशहर
सभी अपने नज़र आते हैं ब-ज़ाहिर लेकिन
इक़बाल अशहर
प्यास दरिया की निगाहों से छुपा रक्खी है
इक़बाल अशहर
फिर तिरा ज़िक्र किया बाद-ए-सबा ने मुझ से
इक़बाल अशहर