Couplets Poetry (page 320)
न जाने कितने चराग़ों को मिल गई शोहरत
इक़बाल अशहर
मुद्दतों ब'अद मयस्सर हुआ माँ का आँचल
इक़बाल अशहर
ले गईं दूर बहुत दूर हवाएँ जिस को
इक़बाल अशहर
किसी को खो के पा लिया किसी को पा के खो दिया
इक़बाल अशहर
जो उस के होंटों की जुम्बिश में क़ैद था 'अशहर'
इक़बाल अशहर
'अशहर' बहुत सी पत्तियाँ शाख़ों से छिन गईं
इक़बाल अशहर
आरज़ू है सूरज को आइना दिखाने की
इक़बाल अशहर
आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा
इक़बाल अशहर
लोग न जाने कैसी कैसी बातें करते हैं
इंतिख़ाब सय्यद
अपने बदन को छोड़ के पछताओगे मियाँ
इंतिख़ाब सय्यद
रू-ब-रू आईने के मैं हूँ नज़र वो आए
इन्तेसार हुसैन आबिदी शाहिद
ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है
इंशा अल्लाह ख़ान
ये अजीब माजरा है कि ब-रोज़-ए-ईद-ए-क़ुर्बां
इंशा अल्लाह ख़ान
उस संग-दिल के हिज्र में चश्मों को अपने आह
इंशा अल्लाह ख़ान
सुब्ह-दम मुझ से लिपट कर वो नशे में बोले
इंशा अल्लाह ख़ान
शैख़-जी ये बयान करो हम भी तो बारी कुछ सुनें
इंशा अल्लाह ख़ान
साँवले तन पे ग़ज़ब धज है बसंती शाल की
इंशा अल्लाह ख़ान
सनम-ख़ाना जाता हूँ तू मुझ को नाहक़
इंशा अल्लाह ख़ान
नज़ाकत उस गुल-ए-राना की देखियो 'इंशा'
इंशा अल्लाह ख़ान
न लगी मुझ को जब उस शोख़-ए-तरहदार की गेंद
इंशा अल्लाह ख़ान
न कह तू शैख़ मुझे ज़ोहद सीख मस्ती छोड़
इंशा अल्लाह ख़ान
न छेड़ ऐ निकहत-ए-बाद-ए-बहारी राह लग अपनी
इंशा अल्लाह ख़ान
मैं ने जो कचकचा कर कल उन की रान काटी
इंशा अल्लाह ख़ान
लैला ओ मजनूँ की लाखों गरचे तस्वीरें खिंचीं
इंशा अल्लाह ख़ान
क्या हँसी आती है मुझ को हज़रत-ए-इंसान पर
इंशा अल्लाह ख़ान
कुछ इशारा जो किया हम ने मुलाक़ात के वक़्त
इंशा अल्लाह ख़ान
ख़ूबान-ए-रोज़गार मुक़ल्लिद तेरी हैं सब
इंशा अल्लाह ख़ान
काटे हैं हम ने यूँही अय्याम ज़िंदगी के
इंशा अल्लाह ख़ान
कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं
इंशा अल्लाह ख़ान
जिस ने यारो मुझ से दावा शेर के फ़न का किया
इंशा अल्लाह ख़ान