Couplets Poetry (page 318)

बंद आँखों में सारा तमाशा देख रहा था

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

ज़ियान-ए-दिल ही इस बाज़ार में सूद-ए-मोहब्बत है

इक़बाल कौसर

वो भी रो रो के बुझा डाला है अब आँखों ने

इक़बाल कौसर

तिरी पहली दीद के साथ ही वो फ़ुसूँ भी था

इक़बाल कौसर

तिरे जुज़्व जुज़्व ख़याल को रग-ए-जाँ में पूरा उतार कर

इक़बाल कौसर

पर ले के किधर जाएँ कुछ दूर तक उड़ आएँ

इक़बाल कौसर

मिरी ख़ाक उस ने बिखेर दी सर-ए-रह ग़ुबार बना दिया

इक़बाल कौसर

जिस तरह लोग ख़सारे में बहुत सोचते हैं

इक़बाल कौसर

ध्यान आया मुझे रात की तन्हा-सफ़री का

इक़बाल कौसर

बनना था तो बनता न फ़रिश्ता न ख़ुदा मैं

इक़बाल कौसर

अब बाँझ ज़मीनों से उम्मीद भी क्या रखना

इक़बाल कौसर

यही नहीं कि निगाहों को अश्क-बार किया

इक़बाल कैफ़ी

फूलों का तबस्सुम भी वो पहला सा नहीं है

इक़बाल कैफ़ी

मोहब्बतों को भी उस ने ख़ता क़रार दिया

इक़बाल कैफ़ी

मैं ऐसे हुस्न-ए-ज़न को ख़ुदा मानता नहीं

इक़बाल कैफ़ी

ख़िज़ाँ का दौर भी आता है एक दिन 'कैफ़ी'

इक़बाल कैफ़ी

गुहर समझा था लेकिन संग निकला

इक़बाल कैफ़ी

ग़ज़ल के रंग में मल्बूस हो कर

इक़बाल कैफ़ी

देखा है मोहब्बत को इबादत की नज़र से

इक़बाल कैफ़ी

अटे हुए हैं फ़क़ीरों के पैरहन 'कैफ़ी'

इक़बाल कैफ़ी

अफ़सोस माबदों में ख़ुदा बेचते हैं लोग

इक़बाल कैफ़ी

ये ख़ुश्क लब ये पाँव के छाले ये सर की धूल

इक़बाल हैदर

वही कैफ़िय्यत-ए-चश्म-ओ-दिल-ओ-जाँ है 'इक़बाल'

इक़बाल हैदर

क़यामत से बहुत पहले क़यामत क्यूँ न हो बरपा

इक़बाल हैदर

ज़माना देखा है हम ने हमारी क़द्र करो

इक़बाल अज़ीम

यूँ सर-ए-राह मुलाक़ात हुई है अक्सर

इक़बाल अज़ीम

सफ़र पे निकले हैं हम पूरे एहतिमाम के साथ

इक़बाल अज़ीम

रौशनी मुझ से गुरेज़ाँ है तो शिकवा भी नहीं

इक़बाल अज़ीम

क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आस्तीं

इक़बाल अज़ीम

पुर्सिश-ए-हाल की फ़ुर्सत तुम्हें मुमकिन है न हो

इक़बाल अज़ीम