Couplets Poetry (page 321)

जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा-अल्लाह

इंशा अल्लाह ख़ान

जावे वो सनम ब्रिज को तो आप कन्हैया

इंशा अल्लाह ख़ान

हज़ार शैख़ ने दाढ़ी बढ़ाई सन की सी

इंशा अल्लाह ख़ान

हर तरफ़ हैं तिरे दीदार के भूके लाखों

इंशा अल्लाह ख़ान

है नूर-ए-बसर मर्दुमक-ए-दीदा में पिन्हाँ यूँ जैसे कन्हैया

इंशा अल्लाह ख़ान

है ख़ाल यूँ तुम्हारे चाह-ए-ज़क़न के अंदर

इंशा अल्लाह ख़ान

ग़ुंचा-ए-गुल के सबा गोद भरी जाती है

इंशा अल्लाह ख़ान

गर्मी ने कुछ आग और भी सीने में लगाई

इंशा अल्लाह ख़ान

दे एक शब को अपनी मुझे ज़र्द शाल तू

इंशा अल्लाह ख़ान

दहकी है आग दिल में पड़े इश्तियाक़ की

इंशा अल्लाह ख़ान

छेड़ने का तो मज़ा जब है कहो और सुनो

इंशा अल्लाह ख़ान

चंद मुद्दत को फिराक़-ए-सनम-ओ-दैर तो है

इंशा अल्लाह ख़ान

बैठता है जब तुंदीला शैख़ आ कर बज़्म में

इंशा अल्लाह ख़ान

अजीब लुत्फ़ कुछ आपस के छेड़-छाड़ में है

इंशा अल्लाह ख़ान

ज़िंदगी आज तेरा लुत्फ़ ओ करम

इन्दिरा वर्मा

ये शफ़क़ चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते

इन्दिरा वर्मा

ये रौशनी तिरे कमरे में ख़ुद नहीं आई

इन्दिरा वर्मा

ये कैसी वक़्त ने बदली है करवट

इन्दिरा वर्मा

यही फ़साना रहा है जुनूँ के सहरा में

इन्दिरा वर्मा

वक़्त ख़ामोश है टूटे हुए रिश्तों की तरह

इन्दिरा वर्मा

उस से मत कहना मिरी बे-सर-ओ-सामानी तक

इन्दिरा वर्मा

तुम्हारे बिना सब अधूरे हैं जानाँ

इन्दिरा वर्मा

सिला दिया है मोहब्बत का तुम ने ये कैसा

इन्दिरा वर्मा

शिकस्ता-दिल अँधेरी शब अकेला राहबर क्यूँ हो

इन्दिरा वर्मा

शाख़-दर-शाख़ होती है ज़ख़्मी

इन्दिरा वर्मा

रौशनी फूट निकली मिसरों से

इन्दिरा वर्मा

मिरी चाहतों में ग़ुरूर हो दिल-ए-ना-तवाँ में सुरूर हो

इन्दिरा वर्मा

किताब-ए-ज़ीस्त का उनवान बन गए हो तुम

इन्दिरा वर्मा

किस ख़ता की सज़ा मिली उस को

इन्दिरा वर्मा

कैसे सहरा में भटकता है मिरा तिश्ना लब

इन्दिरा वर्मा