Couplets Poetry (page 322)
बहारों के आँचल में ख़ुश-बू छुपी है
इन्दिरा वर्मा
बहार आई तो खुल कर कहा है फूलों ने
इन्दिरा वर्मा
अभी से कैसे कहूँ तुम को बेवफ़ा साहब
इन्दिरा वर्मा
आप का लहजा शहद जैसा तरन्नुम-ख़ेज़ है
इन्दिरा वर्मा
सावन की इस रिम-झिम में
इंद्र सराज़ी
राज़-दाँ होते हैं वो घर अक्सर
इंद्र सराज़ी
क्या ख़बर क्या ख़ता मिरी थी कि जो
इंद्र सराज़ी
क्या ख़बर कब बरस के टूट पड़े
इंद्र सराज़ी
कुछ हवा का भी हाथ था वर्ना
इंद्र सराज़ी
ख़ूब थी अब मगर बदल सी गई
इंद्र सराज़ी
जिस का डर था वही हुआ यारो
इंद्र सराज़ी
दुख उदासी मलाल ग़म के सिवा
इंद्र सराज़ी
बड़ी मुश्किल से बहलाया था ख़ुद को
इंद्र सराज़ी
और तो कोई था नहीं शायद
इंद्र सराज़ी
वो डिग्री की बजाए मेम ले कर लौट आया है
इनाम-उल-हक़ जावेद
तमाम उम्र गँवा दी जिसे भुलाने में
इनाम-उल-हक़ जावेद
सुख़न के सारे सलीक़े ज़बाँ में रखता है
इनाम-उल-हक़ जावेद
प्रोफ़ेसर ही जब आते हों हफ़्ता-वार कॉलेज में
इनाम-उल-हक़ जावेद
ज़माना है बुरे हम-साए जैसा
इनाम नदीम
ये मोहब्बत भी एक नेकी है
इनाम नदीम
वो दिल जिस ने हमें रुस्वा किया था
इनाम नदीम
पुकारते थे मुझे आसमाँ मगर मैं ने
इनाम नदीम
नींद से जागा हूँ तो बैठा सोचता हूँ
इनाम नदीम
कुछ रोज़ अभी और है ये आइना-ख़ाना
इनाम नदीम
ख़ामोश खड़ा हूँ मैं दर-ए-ख़्वाब से बाहर
इनाम नदीम
कभी लौट आया मैं दश्त से तो ये शहर भी
इनाम नदीम
जो तेरी आरज़ू मुझ को न होती
इनाम नदीम
जिए गरचे इसी दुनिया में हम भी
इनाम नदीम
हम ठहरे रहेंगे किसी ताबीर को थामे
इनाम नदीम
एक लम्हा लौट कर आया नहीं
इनाम नदीम