Couplets Poetry (page 315)

हम गुनहगारों के क्या ख़ून का फीका था रंग

मिर्ज़ा अज़फ़री

हम फ़रामोश की फ़रामोशी

मिर्ज़ा अज़फ़री

है जानी तुझ में सब ख़ूबी प जाँ सा

मिर्ज़ा अज़फ़री

दिल लिया ताब-ओ-तवाँ ले चुका जाँ भी ले ले

मिर्ज़ा अज़फ़री

धानी जूड़े पे तिरे साँवले मैं मरता हूँ

मिर्ज़ा अज़फ़री

बे-ग़मी तर्क-ए-आलाइक़ है सदा 'अज़फ़रिया'

मिर्ज़ा अज़फ़री

बह चुका ख़ून-ए-दिल आँख तक आ पहुँचा सैल

मिर्ज़ा अज़फ़री

'अज़फ़री' ग़ुंचा-ए-दिल बंद और आई है बहार

मिर्ज़ा अज़फ़री

ऐ मुसव्विर शिताब हो कि अभी

मिर्ज़ा अज़फ़री

शह-ज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

मिर्ज़ा अज़ीम बेग 'अज़ीम'

तू ने ऐ वक़्त पलट कर भी कभी देखा है

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

तेरी दहलीज़ पे इक़रार की उम्मीद लिए

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

तमाम शहर में बिखरा पड़ा है मेरा वजूद

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

न इंतिज़ार करो कल का आज दर्ज करो

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

मेरी आँखों से भी इक बार निकल

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

मैं ने कैसे कैसे मोती ढूँडे हैं

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

मैं ही आईना-ए-दुनिया में चला आया हूँ

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

मैं अधूरा सा हूँ उस के अंदर

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

क्या पता जाने कहाँ आग लगी

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

ख़ुद अपने क़त्ल का इल्ज़ाम ढो रहा हूँ अभी

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

जश्न होता है वहाँ रात ढले

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

हरीम-ए-दिल में ठहर या सरा-ए-जान में रुक

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

एक दरिया को दिखाई थी कभी प्यास अपनी

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

देखते रहते हैं ख़ुद अपना तमाशा दिन रात

मिर्ज़ा अतहर ज़िया

घर से निकलो तो दुआ माँग के निकलो वर्ना

इरफ़ान परभनवी

ज़ख़्म जो तू ने दिए तुझ को दिखा तो दूँ मगर

इरफ़ान अहमद

तर्क-ए-तअल्लुक़ात की बस इंतिहा न पूछ

इरफ़ान अहमद

नश्शा था ज़िंदगी का शराबों से तेज़-तर

इरफ़ान अहमद

जाने किस शहर में आबाद है तू

इरफ़ान अहमद