Couplets Poetry (page 426)
बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं
एजाज तवक्कल
यहाँ तो रोज़ नई आफ़तों से पाला है
एजाज़ अहमद एजाज़
रह-ए-हयात में लाखों थे हम-सफ़र 'एजाज़'
एजाज़ अहमद एजाज़
ये दुनिया है यहाँ असली कहानी पुश्त पर रखना
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
तू मर्द-ए-मोमिन है अपनी मंज़िल को आसमानों पे देख नादाँ
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
तिरे बदन की नज़ाकतों का हुआ है जब हम-रिकाब मौसम
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
शुऊर-ए-नौ-उम्र हूँ न मुझ को मता-ए-रंज-ओ-मलाल देना
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
मैं इक मज़दूर हूँ रोटी की ख़ातिर बोझ उठाता हूँ
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
यूँ गुज़रता है तिरी याद की वादी में ख़याल
एहतिशाम हुसैन
वादी-ए-शब में उजालों का गुज़र हो कैसे
एहतिशाम हुसैन
तेरा ही हो के जो रह जाऊँ तो फिर क्या होगा
एहतिशाम हुसैन
न जाने हार है या जीत क्या है
एहतिशाम हुसैन
मंज़िल न मिली तो ग़म नहीं है
एहतिशाम हुसैन
मैं समझता हूँ मुझे दौलत-ए-कौनैन मिली
एहतिशाम हुसैन
दिल ने चुपके से कहा कोशिश-ए-नाकाम के बाद
एहतिशाम हुसैन
बुझीं शमएँ तो दिल जलाए हैं
एहतिशाम हुसैन
तुम जलाना मुझे चाहो तो जला दो लेकिन
एहतिशाम अख्तर
सोच उन की कैसी है कैसे हैं ये दीवाने
एहतिशाम अख्तर
शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है
एहतिशाम अख्तर
मिरे अज़ीज़ ही मुझ को समझ न पाए कभी
एहतिशाम अख्तर
याद था 'सुक़रात' का क़िस्सा सभी को 'एहतिराम'
एहतराम इस्लाम
उसी से मुझ को मिला इश्तियाक़ मंज़िल का
एहतराम इस्लाम
तौक़ीर अँधेरों की बढ़ा दी गई शायद
एहतराम इस्लाम
शेर के रूप में देते रहना
एहतराम इस्लाम
साथ रखिए काम आएगा बहुत नाम-ए-ख़ुदा
एहतराम इस्लाम
लड़खड़ा कर गिर पड़ी ऊँची इमारत दफ़अतन
एहतराम इस्लाम
इस बार भी शोलों ने मचा डाली तबाही
एहतराम इस्लाम
अहल-ए-दुनिया से मुझे तो कोई अंदेशा न था
एहतराम इस्लाम
याद आई जब मुझे 'फ़रहत' से छोटी थी बहन
एहसान साक़िब
तुम इस तरफ़ से गुज़र चुकी हो मगर गली गुनगुना रही है
एहसान दरबंगावी