Couplets Poetry (page 424)
तेरे मिलाप बिन नहीं 'फ़ाएज़' के दिल को चैन
फ़ाएज़ देहलवी
मुँह बाँध कर कली सा न रह मेरे पास तू
फ़ाएज़ देहलवी
मुझ को औरों से कुछ नहीं है काम
फ़ाएज़ देहलवी
मैं गिरफ़्तार हूँ तिरे मुख पर
फ़ाएज़ देहलवी
ख़ूब-रू आश्ना हैं 'फ़ाएज़' के
फ़ाएज़ देहलवी
ख़ाक सेती सजन उठा के किया
फ़ाएज़ देहलवी
जब सजीले ख़िराम करते हैं
फ़ाएज़ देहलवी
हुस्न बे-साख़्ता भाता है मुझे
फ़ाएज़ देहलवी
गुड़ से मीठा है बोसा तुझ लब का
फ़ाएज़ देहलवी
गड़ सीं मीठा है बोसा तुझ लब का
फ़ाएज़ देहलवी
वो सारी ख़ुशियाँ जो उस ने चाहीं उठा के झोली में अपनी रख लीं
एज़ाज़ अहमद आज़र
इन उजड़ी बस्तियों का कोई तो निशाँ रहे
एज़ाज़ अहमद आज़र
बिछड़ने वाले ने वक़्त-ए-रुख़्सत कुछ इस नज़र से पलट के देखा
एज़ाज़ अहमद आज़र
राह-रौ बच के चल दरख़्तों से
एजाज़ वारसी
मैं उस के ऐब उस को बताता भी किस तरह
एजाज़ वारसी
दरबानों तक के चेहरे रऊनत से मस्ख़ हैं
एजाज़ वारसी
चढ़ते सूरज की मुदारात से पहले 'एजाज़'
एजाज़ वारसी
बरसों में भी छू जाए किसी को तो ग़नीमत
एजाज़ वारसी
ऐ संग-ए-आस्ताँ मिरे सज्दों की लाज रख
एजाज़ वारसी
आप आए हैं हाल पूछा है
एजाज़ वारसी
दुनिया सबब-ए-शोरिश-ए-ग़म पूछ रही है
एजाज़ सिद्दीक़ी
और ज़िक्र क्या कीजे अपने दिल की हालत का
एजाज़ सिद्दीक़ी
आज भी बुरी क्या है कल भी ये बुरी क्या थी
एजाज़ सिद्दीक़ी
वो एक पल की रिफ़ाक़त भी क्या रिफ़ाक़त थी
एजाज़ रहमानी
तालाब तो बरसात में हो जाते हैं कम-ज़र्फ़
एजाज़ रहमानी
जहाँ पे डूब गया मेरी आस का सूरज
एजाज़ रहमानी
गुज़र रहा हूँ मैं सौदा-गरों की बस्ती से
एजाज़ रहमानी
फ़ितरत के तक़ाज़े कभी बदले नहीं जाते
एजाज़ रहमानी
अभी से पाँव के छाले न देखो
एजाज़ रहमानी
सहर होते ही कोई हो गया रुख़्सत गले मिल कर
एजाज़ उबैद