Couplets Poetry (page 423)
वो जिस के हाथ से तक़रीब-ए-दिल-नुमाई थी
फ़हीम शनास काज़मी
उस के लबों की गुफ़्तुगू करते रहे सुबू सुबू
फ़हीम शनास काज़मी
उसी ने चाँद के पहलू में इक चराग़ रखा
फ़हीम शनास काज़मी
तुम्हारी याद निकलती नहीं मिरे दिल से
फ़हीम शनास काज़मी
तेरी गली के मोड़ पे पहुँचे थे जल्द हम
फ़हीम शनास काज़मी
तमाम उम्र हवा की तरह गुज़ारी है
फ़हीम शनास काज़मी
फिर वही शाम वही दर्द वही अपना जुनूँ
फ़हीम शनास काज़मी
कोई भी रस्ता किसी सम्त को नहीं जाता
फ़हीम शनास काज़मी
किसी के दिल में उतरना है कार-ए-ला-हासिल
फ़हीम शनास काज़मी
किन दरीचों के चराग़ों से हमें निस्बत थी
फ़हीम शनास काज़मी
ख़ुद अपने होने का हर इक निशाँ मिटा डाला
फ़हीम शनास काज़मी
गुज़रा मिरे क़रीब से वो इस अदा के साथ
फ़हीम शनास काज़मी
बिछड़ के तुझ से तिरी याद भी नहीं आई
फ़हीम शनास काज़मी
बस एक बार वो आया था सैर करने को
फ़हीम शनास काज़मी
बदलते वक़्त ने बदले मिज़ाज भी कैसे
फ़हीम शनास काज़मी
वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से
फ़हीम जोगापुरी
तुम्हारी याद से ये रात कितनी रौशन है
फ़हीम जोगापुरी
तेरी यादें हो गईं जैसे मुक़द्दस आयतें
फ़हीम जोगापुरी
शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है
फ़हीम जोगापुरी
रस्ते में 'फहीम' उस की तबीअत का बिगड़ना
फ़हीम जोगापुरी
न बात दिल की सुनूँ मैं न दिल सुने मेरी
फ़हीम जोगापुरी
मिलन के ब'अद आती है जुदाई
फ़हीम जोगापुरी
मरघट पथ पर देख के हम को जाने क्या क्या सोचें वो
फ़हीम जोगापुरी
कितने तूफ़ानों से हम उलझे तुझे मालूम क्या
फ़हीम जोगापुरी
किसी के दर पे सज्दा करते करते
फ़हीम जोगापुरी
जाएँगे एक रोज़ समुंदर की गोद में
फ़हीम जोगापुरी
हम अहल-ए-ग़म को हक़ारत से देखने वालो
फ़हीम जोगापुरी
बंद कमरे में तिरा दर्द न बुझ जाए कहीं
फ़हीम जोगापुरी
वो तमाशा ओ खेल होली का
फ़ाएज़ देहलवी
तुझ बदन पर जो लाल सारी है
फ़ाएज़ देहलवी