Couplets Poetry (page 425)

मुक़य्यद हो न जाना ज़ात के गुम्बद में यारो

एजाज़ उबैद

हथेलियों में लकीरों का जाल था कितना

एजाज़ उबैद

उठा रखी है किसी ने कमान सूरज की

एजाज़ गुल

सुस्त-रौ मुसाफ़िर की क़िस्मतों पे क्या रोना

एजाज़ गुल

क़िस्मत की ख़राबी है कि जाता हूँ ग़लत सम्त

एजाज़ गुल

पाया न कुछ ख़ला के सिवा अक्स-ए-हैरती

एजाज़ गुल

नतीजा एक सा निकला दिमाग़ और दिल का

एजाज़ गुल

नहीं खुलता कि आख़िर ये तिलिस्माती तमाशा सा

एजाज़ गुल

मश्क़-ए-सुख़न में दिल भी हमेशा से है शरीक

एजाज़ गुल

मैं उम्र को तो मुझे उम्र खींचती है उलट

एजाज़ गुल

कुछ देर ठहर और ज़रा देख तमाशा

एजाज़ गुल

कोई सबब तो है ऐसा कि एक उम्र से हैं

एजाज़ गुल

कभी क़तार से बाहर कभी क़तार के बीच

एजाज़ गुल

जो क़िस्सा-गो ने सुनाया वही सुना गया है

एजाज़ गुल

हुआ के खेल में शिरकत के वास्ते मुझ को

एजाज़ गुल

होता है फिर वो और किसी याद के सुपुर्द

एजाज़ गुल

हो नहीं पाया है समझौता कभी दोनों के बीच

एजाज़ गुल

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई था अगर

एजाज़ गुल

हैरत है सब तलाश पे उस की रहे मुसिर

एजाज़ गुल

दिनों महीनों आँखें रोईं नई रुतों की ख़्वाहिश में

एजाज़ गुल

धूप जवानी का याराना अपनी जगह

एजाज़ गुल

दर खोल के देखूँ ज़रा इदराक से बाहर

एजाज़ गुल

चाहा था मफ़र दिल ने मगर ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर

एजाज़ गुल

बुझी नहीं मिरे आतिश-कदे की आग अभी

एजाज़ गुल

बे-सबब जम'अ तो करता नहीं तीर ओ तरकश

एजाज़ गुल

अतवार उस के देख के आता नहीं यक़ीं

एजाज़ गुल

अजीब शख़्स था मैं भी भुला नहीं पाया

एजाज़ गुल

मैं वहाँ हूँ जहाँ नहीं कोई

एजाज़ आज़मी

दो तरफ़ था हुजूम सदियों का

एजाज़ आज़मी

क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो

एजाज तवक्कल