Couplets Poetry (page 496)

टूट कर रूह में शीशों की तरह चुभते हैं

असग़र मेहदी होश

साग़र नहीं कि झूम के उट्ठे उठा लिया

असग़र मेहदी होश

मिट्टी में कितने फूल पड़े सूखते रहे

असग़र मेहदी होश

मेरे ही पाँव मिरे सब से बड़े दुश्मन हैं

असग़र मेहदी होश

क्या सितम करते हैं मिट्टी के खिलौने वाले

असग़र मेहदी होश

ख़ुदा बदल न सका आदमी को आज भी 'होश'

असग़र मेहदी होश

खो गई जा के नज़र यूँ रुख़-ए-रौशन के क़रीब

असग़र मेहदी होश

जो साए बिछाते हैं फल फूल लुटाते हैं

असग़र मेहदी होश

जो हादिसा कि मेरे लिए दर्दनाक था

असग़र मेहदी होश

जाने किस किस का गला कटता पस-ए-पर्दा-ए-इश्क़

असग़र मेहदी होश

हम भी करते रहें तक़ाज़ा रोज़

असग़र मेहदी होश

गिर भी जाती नहीं कम-बख़्त कि फ़ुर्सत हो जाए

असग़र मेहदी होश

डूबने वाले को साहिल से सदाएँ मत दो

असग़र मेहदी होश

दीवार उन के घर की मिरी धूप ले गई

असग़र मेहदी होश

बच्चे खुली फ़ज़ा में कहाँ तक निकल गए

असग़र मेहदी होश

आने वाले दौर में जो पाएगा पैग़म्बरी

असग़र मेहदी होश

आदमी पहले भी नंगा था मगर जिस्म तलक

असग़र मेहदी होश

पत्थर लिए हर मोड़ पे कुछ लोग खड़े हैं

असग़र गोरखपुरी

ज़ुल्फ़ थी जो बिखर गई रुख़ था कि जो निखर गया

असग़र गोंडवी

ज़ाहिद ने मिरा हासिल-ए-ईमाँ नहीं देखा

असग़र गोंडवी

यूँ मुस्कुराए जान सी कलियों में पड़ गई

असग़र गोंडवी

ये भी फ़रेब से हैं कुछ दर्द आशिक़ी के

असग़र गोंडवी

ये आस्तान-ए-यार है सेहन-ए-हरम नहीं

असग़र गोंडवी

यहाँ कोताही-ए-ज़ौक़-ए-अमल है ख़ुद गिरफ़्तारी

असग़र गोंडवी

यहाँ कोताही-ए-ज़ौक़-ए-अमल है ख़ुद गिरफ़्तारी

असग़र गोंडवी

वो शोरिशें निज़ाम-ए-जहाँ जिन के दम से है

असग़र गोंडवी

वो नग़्मा बुलबुल-ए-रंगीं-नवा इक बार हो जाए

असग़र गोंडवी

वहीं से इश्क़ ने भी शोरिशें उड़ाई हैं

असग़र गोंडवी

उस जल्वा-गाह-ए-हुस्न में छाया है हर तरफ़

असग़र गोंडवी

सुनता हूँ बड़े ग़ौर से अफ़्साना-ए-हस्ती

असग़र गोंडवी