Couplets Poetry (page 495)
वहीं के पत्थरों से पूछ मेरा हाल-ए-ज़िंदगी
अशहर हाशमी
उस से मिलने की तलब में जी लिए कुछ और दिन
अशहर हाशमी
तिरा ग़ुरूर झुक के जब मिला मिरे वजूद से
अशहर हाशमी
रहगुज़र भी तिरी पहले थी अजनबी
अशहर हाशमी
मेरी दुनिया में समुंदर का कहीं नाम नहीं
अशहर हाशमी
'अशहर' कहीं क़रीब ही तारीक ग़ार है
अशहर हाशमी
ज़िंदगी से समझौता आज हो गया कैसे
असग़र वेलोरी
उन के हाथों से मिला था पी लिया
असग़र वेलोरी
तू ने अब तक जिसे नहीं समझा
असग़र वेलोरी
तिरे महल में हज़ारों चराग़ जलते हैं
असग़र वेलोरी
शिकार अपनी अना का है आज का इंसाँ
असग़र वेलोरी
रौशनी जब से मुझे छोड़ गई
असग़र वेलोरी
पढ़ते थे किताबों में क़यामत का समाँ
असग़र वेलोरी
मुझ को ग़म का न कभी दर्द का एहसास रहा
असग़र वेलोरी
लोग अच्छों को भी किस दिल से बुरा कहते हैं
असग़र वेलोरी
खिलना हर एक फूल का 'असग़र' है मोजज़ा
असग़र वेलोरी
जितना रोना था रो चुके आदम
असग़र वेलोरी
दुनिया से ख़त्म हो गया इंसान का वजूद
असग़र वेलोरी
ऐ चारागरो पास तुम्हारे न मिलेगी
असग़र वेलोरी
तलातुम में कभी उतरा था 'असग़र'
असग़र शमीम
शहर तो कब का जल चुका 'असग़र'
असग़र शमीम
सारी दुनिया को जीतने वाला
असग़र शमीम
सर पे दस्तार जब सलामत है
असग़र शमीम
कहाँ सर छुपाएँ पता ही नहीं
असग़र शमीम
दिल में 'असग़र' के ख़ुशियों की बरसात थी
असग़र शमीम
जिसे कभी सर-ए-मिंबर न कह सका वाइज़
असग़र सलीम
इस एक बात से गुलचीं का दिल धड़कता है
असग़र सलीम
ग़ुबार सा है सर-ए-शाख़-सार कहते हैं
असग़र सलीम
जो लोग मेरा नक़्श-ए-क़दम चूम रहे थे
असग़र राही
ज़िक्र-ए-अस्लाफ़ से बेहतर है कि ख़ामोश रहें
असग़र मेहदी होश