Couplets Poetry (page 497)
सौ बार तिरा दामन हाथों में मिरे आया
असग़र गोंडवी
सौ बार तिरा दामन हाथों में मिरे आया
असग़र गोंडवी
रूदाद-ए-चमन सुनता हूँ इस तरह क़फ़स में
असग़र गोंडवी
रिंद जो ज़र्फ़ उठा लें वही साग़र बन जाए
असग़र गोंडवी
क़हर है थोड़ी सी भी ग़फ़लत तरीक़-ए-इश्क़ में
असग़र गोंडवी
पहली नज़र भी आप की उफ़ किस बला की थी
असग़र गोंडवी
नियाज़-ए-इश्क़ को समझा है क्या ऐ वाइज़-ए-नादाँ
असग़र गोंडवी
नहीं दैर ओ हरम से काम हम उल्फ़त के बंदे हैं
असग़र गोंडवी
न कुछ फ़ना की ख़बर है न है बक़ा मालूम
असग़र गोंडवी
मुझ से जो चाहिए वो दर्स-ए-बसीरत लीजे
असग़र गोंडवी
मुझ को ख़बर रही न रुख़-ए-बे-नक़ाब की
असग़र गोंडवी
मिरी वहशत पे बहस-आराइयाँ अच्छी नहीं ज़ाहिद
असग़र गोंडवी
मैं क्या कहूँ कहाँ है मोहब्बत कहाँ नहीं
असग़र गोंडवी
मैं कामयाब-ए-दीद भी महरूम-ए-दीद भी
असग़र गोंडवी
माइल-ए-शेर-ओ-ग़ज़ल फिर है तबीअत 'असग़र'
असग़र गोंडवी
लोग मरते भी हैं जीते भी हैं बेताब भी हैं
असग़र गोंडवी
लज़्ज़त-ए-सज्दा-हा-ए-शौक़ न पूछ
असग़र गोंडवी
क्या मस्तियाँ चमन में हैं जोश-ए-बहार से
असग़र गोंडवी
क्या क्या हैं दर्द-ए-इश्क़ की फ़ित्ना-तराज़ियाँ
असग़र गोंडवी
कुछ मिलते हैं अब पुख़्तगी-ए-इश्क़ के आसार
असग़र गोंडवी
जीना भी आ गया मुझे मरना भी आ गया
असग़र गोंडवी
इश्क़ की बेताबियों पर हुस्न को रहम आ गया
असग़र गोंडवी
हम उस निगाह-ए-नाज़ को समझे थे नेश्तर
असग़र गोंडवी
हर इक जगह तिरी बर्क़-ए-निगाह दौड़ गई
असग़र गोंडवी
हल कर लिया मजाज़ हक़ीक़त के राज़ को
असग़र गोंडवी
एक ऐसी भी तजल्ली आज मय-ख़ाने में है
असग़र गोंडवी
इक अदा इक हिजाब इक शोख़ी
असग़र गोंडवी
दास्ताँ उन की अदाओं की है रंगीं लेकिन
असग़र गोंडवी
छुट जाए अगर दामन-ए-कौनैन तो क्या ग़म
असग़र गोंडवी
चला जाता हूँ हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस से
असग़र गोंडवी