Couplets Poetry (page 498)
बिस्तर-ए-ख़ाक पे बैठा हूँ न मस्ती है न होश
असग़र गोंडवी
बे-महाबा हो अगर हुस्न तो वो बात कहाँ
असग़र गोंडवी
बना लेता है मौज-ए-ख़ून-ए-दिल से इक चमन अपना
असग़र गोंडवी
'असग़र' से मिले लेकिन 'असग़र' को नहीं देखा
असग़र गोंडवी
'असग़र' हरीम-ए-इश्क़ में हस्ती ही जुर्म है
असग़र गोंडवी
'असग़र' ग़ज़ल में चाहिए वो मौज-ए-ज़िंदगी
असग़र गोंडवी
अल्लाह-रे चश्म-ए-यार की मोजिज़-बयानियाँ
असग़र गोंडवी
अक्स किस चीज़ का आईना-ए-हैरत में नहीं
असग़र गोंडवी
ऐ शैख़ वो बसीत हक़ीक़त है कुफ़्र की
असग़र गोंडवी
आरिज़-ए-नाज़ुक पे उन के रंग सा कुछ आ गया
असग़र गोंडवी
आलाम-ए-रोज़गार को आसाँ बना दिया
असग़र गोंडवी
आलम से बे-ख़बर भी हूँ आलम में भी हूँ मैं
असग़र गोंडवी
उजलत के अलाव में किए फ़ैसले 'आबिद'
असग़र आबिद
जिस्म पाबंद-ए-गुल सही 'आबिद'
असग़र आबिद
हम तो उस पस्ती-ए-एहसास पे जीते हैं जहाँ
असग़र आबिद
ये हुस्न-ए-दिल-फ़रेब ये आलम शबाब का
असर सहबाई
तुम्हारी याद में दुनिया को हूँ भुलाए हुए
असर सहबाई
तेरे शबाब ने किया मुझ को जुनूँ से आश्ना
असर सहबाई
सारी दुनिया से बे-नियाज़ी है
असर सहबाई
सज्दे के दाग़ से न हुई आश्ना जबीं
असर सहबाई
ख़ुदा की देन है जिस को नसीब हो जाए
असर सहबाई
जिस हुस्न की है चश्म-ए-तमन्ना को जुस्तुजू
असर सहबाई
जहाँ पे छाया सहाब-ए-मस्ती बरस रही है शराब-ए-मस्ती
असर सहबाई
इलाही कश्ती-ए-दिल बह रही है किस समुंदर में
असर सहबाई
आह क्या क्या आरज़ूएँ नज़्र-ए-हिरमाँ हो गईं
असर सहबाई
तुम चाहो तो दो लफ़्ज़ों में तय होते हैं झगड़े
असर रामपुरी
इश्क़ में शिकवा कुफ़्र है और हर इल्तिजा हराम
असर रामपुरी
बे-वज्ह नहीं हुस्न की तनवीर में ताबिश
असर रामपुरी
ज़िंदगी और ज़िंदगी की यादगार
असर लखनवी
ये सोचते ही रहे और बहार ख़त्म हुई
असर लखनवी