Couplets Poetry (page 521)

धूप निकली है बारिशों के ब'अद

अंजुम लुधियानवी

आप के भी हो जाएँगे हम

अंजुम लुधियानवी

शब को इक बार खुल के रोता हूँ

अंजुम ख़याली

मुझे कुछ देर रुकना चाहिए था

अंजुम ख़याली

मुझे हँसी भी मिरे हाल पर नहीं आती

अंजुम ख़याली

मिरे मज़ार पे आ कर दिए जलाएगा

अंजुम ख़याली

कुछ तसावीर बोल पड़ती हैं

अंजुम ख़याली

कोई तोहमत हो मिरे नाम चली आती है

अंजुम ख़याली

कहाँ मिला मैं तुझे ये सवाल ब'अद का है

अंजुम ख़याली

जाँ क़र्ज़ है सो उतारते हैं

अंजुम ख़याली

इस नाम का कोई भी नहीं है

अंजुम ख़याली

बाज़ वादे किए नहीं जाते

अंजुम ख़याली

अज़ाँ पे क़ैद नहीं बंदिश-ए-नमाज़ नहीं

अंजुम ख़याली

अँधेरी रात है साया तो हो नहीं सकता

अंजुम ख़याली

आँख झपकीं तो इतने अर्से में

अंजुम ख़याली

ज़मीं की गोद में इतना सुकून था 'अंजुम'

अंजुम ख़लीक़

नख़्ल-ए-अना में ज़ोर-ए-नुमू किस ग़ज़ब का था

अंजुम ख़लीक़

मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा

अंजुम ख़लीक़

क्या जानें सफ़र ख़ैर से गुज़रे कि न गुज़रे

अंजुम ख़लीक़

जिन को कहा न जा सका जिन को सुना नहीं गया

अंजुम ख़लीक़

इंसान की निय्यत का भरोसा नहीं कोई

अंजुम ख़लीक़

बीते हुए लम्हात को पहचान में रखना

अंजुम ख़लीक़

यक-ब-यक जाँ से गुज़रना तो है आसाँ 'अंजुम'

अंजुम इरफ़ानी

याद है क़िस्सा-ए-ग़म का मुझे हर लफ़्ज़ अभी

अंजुम इरफ़ानी

सर-ए-राह मिल के बिछड़ गए था बस एक पल का वो हादसा

अंजुम इरफ़ानी

सफ़र में हर क़दम रह रह के ये तकलीफ़ ही देते

अंजुम इरफ़ानी

मिरी नज़र में आ गया है जब से इक सहीफ़ा-रुख़

अंजुम इरफ़ानी

लौट कर यक़ीनन मैं एक रोज़ आऊँगा

अंजुम इरफ़ानी

क्या अजब है कि ये मुट्ठी में हमारी आ जाए

अंजुम इरफ़ानी

कोई पुराना ख़त कुछ भूली-बिसरी याद

अंजुम इरफ़ानी