Couplets Poetry (page 520)

ऐसी क्या बीत गई मुझ पे कि जिस के बाइस

अंजुम सलीमी

अध-बुने ख़्वाबों का अम्बार पड़ा है दिल में

अंजुम सलीमी

आती जाती हुई तन्हाई को पहचानता हूँ

अंजुम सलीमी

आँख खुल कर अभी मानूस नहीं हो पाती

अंजुम सलीमी

आगे बिछी पड़ी रहीं उस के बदन की नेमतें

अंजुम सलीमी

ये जितने मसअले हैं मश्ग़ले हैं सब फ़राग़त के

अंजुम रूमानी

सच के सौदे में न पड़ना कि ख़सारा होगा

अंजुम रूमानी

रहे ज़रा दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता पर नज़र 'अंजुम'

अंजुम रूमानी

क़लंदरी है कि रखता है दिल ग़नी 'अंजुम'

अंजुम रूमानी

पाप करो जी खोल कर धब्बों की क्या सोच

अंजुम रूमानी

मौसम का आह-ओ-नाला से अंदाज़ा कीजिए

अंजुम रूमानी

किस की जबीं पे हैं ये सितारे अरक़ अरक़

अंजुम रूमानी

दिल से उठता है सुब्ह-ओ-शाम धुआँ

अंजुम रूमानी

देते नहीं सुझाई जो दुनिया के ख़त्त-ओ-ख़ाल

अंजुम रूमानी

और कुछ दिन ख़राब हो लीजे

अंजुम रूमानी

आज का झगड़ा आज चुका

अंजुम रूमानी

आएगी हम को रास न यक-रंगी-ए-ख़ला

अंजुम रूमानी

तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए

अंजुम रहबर

तुझ को दुनिया के साथ चलना है

अंजुम रहबर

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

अंजुम रहबर

माँ मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं

अंजुम रहबर

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

अंजुम रहबर

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में

अंजुम रहबर

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में

अंजुम रहबर

मैं हर दीवार के दोनों तरफ़ यूँ देख लेता हूँ

अंजुम नियाज़ी

वतन के लोग सताते थे जब वतन में थे

अंजुम मानपुरी

तेरे जाते ही ये हुआ महसूस

अंजुम लुधियानवी

रंग ही से फ़रेब खाते रहें

अंजुम लुधियानवी

ख़ुद-कुशी करने में भी नाकाम रह जाते हैं हम

अंजुम लुधियानवी

दोस्ती बंदगी वफ़ा-ओ-ख़ुलूस

अंजुम लुधियानवी