Couplets Poetry (page 518)
तुम अकेले में मिले ही नहीं वर्ना तुम को
अंजुम सलीमी
तुझ से ये कैसा तअल्लुक़ है जिसे जब चाहूँ
अंजुम सलीमी
तू मिरे सब्र का अंदाज़ा लगा सकता है
अंजुम सलीमी
ठीक से याद भी नहीं अब तो
अंजुम सलीमी
तेरे अंदर की उदासी के मुशाबह हूँ मैं
अंजुम सलीमी
शब-ए-जमाल सलामत रहें तिरे परी-ज़ाद
अंजुम सलीमी
साथ बारिश में लिए फिरते हो उस को 'अंजुम'
अंजुम सलीमी
सभी दरवाज़े खुले हैं मिरी तन्हाई के
अंजुम सलीमी
रौशनी भी नहीं हवा भी नहीं
अंजुम सलीमी
पुराना ज़हर नए नाम से मिला है मुझे
अंजुम सलीमी
पत्थर में कौन जोंक लगाएगा मेरे दोस्त
अंजुम सलीमी
मुझ से ख़ाली है मेरा आईना
अंजुम सलीमी
मुझे पता है कि बर्बाद हो चुका हूँ मैं
अंजुम सलीमी
मिट के आसूदा हो गया हूँ मैं
अंजुम सलीमी
मेरी मिट्टी से बहुत ख़ुश हैं मिरे कूज़ा-गर
अंजुम सलीमी
मेरे चेहरे पे हैं आँखें मिरे सीने में है दिल
अंजुम सलीमी
माज़रत रौंदे हुए फूलों से कर लूँ तो चलूँ
अंजुम सलीमी
माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है
अंजुम सलीमी
मैं सब का सब मोहब्बत के लिए हूँ
अंजुम सलीमी
मैं ख़ुद से मिल के कभी साफ़ साफ़ कह दूँगा
अंजुम सलीमी
मैं जिस चराग़ से बैठा था लौ लगाए हुए
अंजुम सलीमी
मैं एक एक तमन्ना से पूछ बैठा हूँ
अंजुम सलीमी
मैं दिल-ए-गिरफ़्ता तुझे गुनगुनाता रहता हूँ
अंजुम सलीमी
मैं चीख़ता रहा कुछ और भी है मेरा इलाज
अंजुम सलीमी
मैं अंधेरे में हूँ मगर मुझ में
अंजुम सलीमी
मैं आज ख़ुद से मुलाक़ात करने वाला हूँ
अंजुम सलीमी
कुछ तो खिंची खिंची सी थी साअत विसाल की
अंजुम सलीमी
किसी तरह से नज़र मुतमइन नहीं होती
अंजुम सलीमी
किसी तरह से मैं टल जाऊँ अपनी मर्ज़ी से
अंजुम सलीमी
किस ज़माने में मुझ को भेज दिया
अंजुम सलीमी