Couplets Poetry (page 519)

किस शफ़क़त में गुँधे हुए मौला माँ बाप दिए

अंजुम सलीमी

किस ने आबाद किया है मरी वीरानी को

अंजुम सलीमी

ख़्वाब शर्मिंदा-ए-विसाल हुआ

अंजुम सलीमी

खुली हुई है जो कोई आसान राह मुझ पर

अंजुम सलीमी

ख़ुद तक मिरी रसाई नहीं हो रही अभी

अंजुम सलीमी

कर रहा हूँ तुझे ख़ुशी से बसर

अंजुम सलीमी

कैसी होती हैं उदासी की जड़ें

अंजुम सलीमी

कहो हवा से कि इतनी चराग़-पा न फिरे

अंजुम सलीमी

कहने सुनने के लिए और बचा ही क्या है

अंजुम सलीमी

जस्त भरता हुआ फ़र्दा के दहाने की तरफ़

अंजुम सलीमी

जब ख़ुदा भी नहीं था साथ मरे

अंजुम सलीमी

जाने तोड़े थे किस ने किस के लिए

अंजुम सलीमी

इतना तरसाया गया मुझ को मोहब्बत से कि अब

अंजुम सलीमी

इतना बे-ताब न हो मुझ से बिछड़ने के लिए

अंजुम सलीमी

इश्क़ फ़रमा लिया तो सोचता हूँ

अंजुम सलीमी

हिज्र में भी हम एक दूसरे के

अंजुम सलीमी

हिज्र को बीच में नहीं छोड़ा

अंजुम सलीमी

हर तरफ़ तू नज़र आता है जिधर जाता हूँ

अंजुम सलीमी

हाँ ज़माने की नहीं अपनी तो सुन सकता था

अंजुम सलीमी

एक ताबीर की सूरत नज़र आई है इधर

अंजुम सलीमी

एक दिन मेरी ख़ामुशी ने मुझे

अंजुम सलीमी

एक बे-नाम उदासी से भरा बैठा हूँ

अंजुम सलीमी

दोस्तो मेरे लिए कोई भी अफ़्सुर्दा न हो

अंजुम सलीमी

दर्द से भरता रहा ज़ात के ख़ाली-पन को

अंजुम सलीमी

चल तो सकता था मैं भी पानी पर

अंजुम सलीमी

चख रहा था मैं इक बदन का नमक

अंजुम सलीमी

बुझने दे सब दिए मुझे तन्हाई चाहिए

अंजुम सलीमी

बस अंधेरे ने रंग बदला है

अंजुम सलीमी

बरहम हैं मुझ पे इस लिए दोनों तरफ़ के लोग

अंजुम सलीमी

अपनी तस्दीक़ मुझे तेरी गवाही से हुई

अंजुम सलीमी