Couplets Poetry (page 517)
कुछ ख़बर होती तो मैं अपनी ख़बर क्यूँ रखता
अनवर देहलवी
किस सोच में हैं आइने को आप देख कर
अनवर देहलवी
कमर बाँधी है तौबा तोड़ने पर
अनवर देहलवी
कैसी हया कहाँ की वफ़ा पास-ए-ख़ल्क़ क्या
अनवर देहलवी
कैसी हया कहाँ की वफ़ा पास-ए-ख़ल्क़ क्या
अनवर देहलवी
हश्र को मानता हूँ बे-देखे
अनवर देहलवी
हर शय को इंतिहा है यक़ीं है कि वस्ल हो
अनवर देहलवी
गोया कि सब ग़लत हैं मिरी बद-गुमानियाँ
अनवर देहलवी
गरचे क्या कुछ थे मगर आप को कुछ भी न गिना
अनवर देहलवी
बे-तरह पड़ती है नज़र उन की
अनवर देहलवी
'अनवर' ने बदले जान के ली जिंस-ए-दर्द-ए-दिल
अनवर देहलवी
अल्लाह-रे फ़र्त-ए-शौक़-ए-असीरी के शौक़ में
अनवर देहलवी
हमारे इश्क़ और उन के तग़ाफ़ुल का ये आलम है
अनवर बरेलवी
कभी कभी तो ये दिल में सवाल उठता है
अनवर अंजुम
कोई भी सजनी किसी भी साजन की मुंतज़िर है न मुज़्तरिब है
अनवर अलीमी
जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं
अनवर महमूद खालिद
इतना सन्नाटा है कुछ बोलते डर लगता है
अनवर महमूद खालिद
हुए असीर तो फिर उम्र भर रिहा न हुए
अनवर महमूद खालिद
इक धमाके से न फट जाए कहीं मेरा वजूद
अनवर महमूद खालिद
ये अलामत कौन सी है किस से पूछूँ ऐ हवा
अनसर अली अनसर
सच्चाई की ख़ुशबू की रमक़ तक न थी उन में
अंजुम तराज़ी
जिस दिन शहर जला था उस दिन धूप में कितनी तेज़ी थी
अंजुम तराज़ी
इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे
अंजुम तराज़ी
ज़मीन हाँपने लगती है इक जगह रुक कर
अंजुम सलीमी
ये मोहब्बत का जो अम्बार पड़ा है मुझ में
अंजुम सलीमी
ये भी आग़ाज़-ए-मोहब्बत में बहुत है मुझ को
अंजुम सलीमी
वो इक दिन जाने किस को याद कर के
अंजुम सलीमी
उठाए फिरता रहा मैं बहुत मोहब्बत को
अंजुम सलीमी
उस ख़ुदा की तलाश है 'अंजुम'
अंजुम सलीमी
उदासी खींच लाई है यहाँ तक
अंजुम सलीमी