Couplets Poetry (page 593)
एक आईना रू-ब-रू है अभी
अदा जाफ़री
दिल के वीराने में घूमे तो भटक जाओगे
अदा जाफ़री
बोलते हैं दिलों के सन्नाटे
अदा जाफ़री
बस एक बार मनाया था जश्न-ए-महरूमी
अदा जाफ़री
बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं
अदा जाफ़री
अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो
अदा जाफ़री
अभी सहीफ़ा-ए-जाँ पर रक़म भी क्या होगा
अदा जाफ़री
आ देख कि मेरे आँसुओं में
अदा जाफ़री
ये नहीं कि तू ने भेजा ही नहीं पयाम कोई
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
तुम चलो इस के साथ या न चलो
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
तमाम उम्र ख़ुशी की तलाश में गुज़री
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नई सहर के हसीन सूरज तुझे ग़रीबों से वास्ता क्या
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
मिला न घर से निकल कर भी चैन ऐ 'ज़ाहिद'
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
लोग चुन लें जिस की तहरीरें हवालों के लिए
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
जो सोते हैं नहीं कुछ ज़िक्र उन का वो तो सोते हैं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
गुलशन में न हम होंगे तो फिर सोग हमारा
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
एक हो जाएँ तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
कोई नालाँ कोई गिर्यां कोई बिस्मिल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
बे-ख़ुद भी हैं होशियार भी हैं देखने वाले
अबुल कलाम आज़ाद
ये सच है उस से बिछड़ कर मुझे ज़माना हुआ
अबुल हसनात हक़्क़ी
ये बात अलग है किसी धारे पे नहीं है
अबुल हसनात हक़्क़ी
वो कश्ती से देते थे मंज़र की दाद
अबुल हसनात हक़्क़ी
वो आ रहा था मगर मैं निकल गया कहीं और
अबुल हसनात हक़्क़ी
मेरी वहशत भी सकूँ-ना-आश्ना मेरी तरह
अबुल हसनात हक़्क़ी
मैं क़त्ल हो के भी शर्मिंदा अपने-आप से हूँ
अबुल हसनात हक़्क़ी
जाने क्या सूरत-ए-हालात रक़म थी उस में
अबुल हसनात हक़्क़ी
बे-नियाज़-ए-दहर कर देता है इश्क़
अबुल हसनात हक़्क़ी
मेहनत से मिल गया जो सफ़ीने के बीच था
अबु तुराब
तकमील-ए-आरज़ू से भी होता है ग़म कभी
अबु मोहम्मद सहर
'सहर' अब होगा मेरा ज़िक्र भी रौशन-दिमाग़ों में
अबु मोहम्मद सहर