Couplets Poetry (page 591)
ख़ुद-ब-ख़ुद शाख़ लचक जाएगी
आदिल मंसूरी
खिड़की ने आँखें खोली
आदिल मंसूरी
कब तक पड़े रहोगे हवाओं के हाथ में
आदिल मंसूरी
कब से टहल रहे हैं गरेबान खोल कर
आदिल मंसूरी
जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर
आदिल मंसूरी
जिस्म की मिट्टी न ले जाए बहा कर साथ में
आदिल मंसूरी
जाने किस को ढूँडने दाख़िल हुआ है जिस्म में
आदिल मंसूरी
हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं
आदिल मंसूरी
हुदूद-ए-वक़्त से बाहर अजब हिसार में हूँ
आदिल मंसूरी
हम्माम के आईने में शब डूब रही थी
आदिल मंसूरी
गिरते रहे नुजूम अंधेरे की ज़ुल्फ़ से
आदिल मंसूरी
दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए
आदिल मंसूरी
दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का
आदिल मंसूरी
दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं
आदिल मंसूरी
दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी
आदिल मंसूरी
चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं
आदिल मंसूरी
बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था
आदिल मंसूरी
आवाज़ की दीवार भी चुप-चाप खड़ी थी
आदिल मंसूरी
ऐसे डरे हुए हैं ज़माने की चाल से
आदिल मंसूरी
याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी 'अदीम'
अदीम हाशमी
वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार-सू
अदीम हाशमी
वो जो तर्क-ए-रब्त का अहद था कहीं टूटने तो नहीं लगा
अदीम हाशमी
शोर सा एक हर इक सम्त बपा लगता है
अदीम हाशमी
सदाएँ एक सी यकसानियत में डूब जाती हैं
अदीम हाशमी
परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है
अदीम हाशमी
परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है
अदीम हाशमी
मिरे हमराह गरचे दूर तक लोगों की रौनक़ है
अदीम हाशमी
मैं दरिया हूँ मगर बहता हूँ मैं कोहसार की जानिब
अदीम हाशमी
माह अच्छा है बहुत ही न ये साल अच्छा है
अदीम हाशमी
क्यूँ परखते हो सवालों से जवाबों को 'अदीम'
अदीम हाशमी