Couplets Poetry (page 590)
ख़ुशनुमा दाएरे बनते ही चले जाते हैं
अफ़सर आज़री
तुम्हारे हिज्र में क्यूँ ज़िंदगी न मुश्किल हो
अफ़सर इलाहाबादी
न हो या रब ऐसी तबीअत किसी की
अफ़सर इलाहाबादी
मुझे गुम-शुदा दिल का ग़म है तो ये है
अफ़सर इलाहाबादी
ख़बर देती है याद करता है कोई
अफ़सर इलाहाबादी
हमारा कोह-ए-ग़म क्या संग-ए-ख़ारा है जो कट जाता
अफ़सर इलाहाबादी
क़ुर्बतें भी दूरियों का बन गईं अक्सर सबब
अफ़रोज़ तालिब
ये खुला जिस्म खुले बाल ये हल्के मल्बूस
अफ़रोज़ आलम
ये खुला जिस्म खुले बाल ये हल्के मल्बूस
अफ़रोज़ आलम
मैं ज़ेहनी तौर से आज़ाद होने लगता हूँ
अफ़रोज़ आलम
हलाल रिज़्क़ का मतलब किसान से पूछो
अादिल रशीद
ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में
आदिल मंसूरी
यादों ने उसे तोड़ दिया मार के पत्थर
आदिल मंसूरी
वो तुम तक कैसे आता
आदिल मंसूरी
वो जान-ए-नौ-बहार जिधर से गुज़र गया
आदिल मंसूरी
उँगली से उस के जिस्म पे लिक्खा उसी का नाम
आदिल मंसूरी
तुम को दावा है सुख़न-फ़हमी का
आदिल मंसूरी
तू किस के कमरे में थी
आदिल मंसूरी
तस्वीर में जो क़ैद था वो शख़्स रात को
आदिल मंसूरी
फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया
आदिल मंसूरी
फिर कोई वुसअत-ए-आफ़ाक़ पे साया डाले
आदिल मंसूरी
फिर बालों में रात हुई
आदिल मंसूरी
नींद भी जागती रही पूरे हुए न ख़्वाब भी
आदिल मंसूरी
नश्शा सा डोलता है तिरे अंग अंग पर
आदिल मंसूरी
मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
आदिल मंसूरी
मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर
आदिल मंसूरी
क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो
आदिल मंसूरी
कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया
आदिल मंसूरी
किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
आदिल मंसूरी
ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर
आदिल मंसूरी