Couplets Poetry (page 588)

जो दिल में है वही बाहर दिखाई देता है

आफ़ताब शम्सी

देख कर उस को लगा जैसे कहीं हो देखा

आफ़ताब शम्सी

या साल ओ माह था तू मिरे साथ या तो अब

आफ़ताब शाह आलम सानी

घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया

आफ़ताब शाह आलम सानी

ये हिजरतें हैं ज़मीन ओ ज़माँ से आगे की

आफ़ताब इक़बाल शमीम

फिर से तालीफ़-ए-दिल हो फिर कोई

आफ़ताब इक़बाल शमीम

लम्हा मुंसिफ़ भी है मुजरिम भी है मजबूरी का

आफ़ताब इक़बाल शमीम

लफ़्ज़ों में ख़ाली जगहें भर लेने से

आफ़ताब इक़बाल शमीम

क्या रात के आशोब में वो ख़ुद से लड़ा था

आफ़ताब इक़बाल शमीम

ख़्वाब के आगे शिकस्त-ए-ख़्वाब का था सामना

आफ़ताब इक़बाल शमीम

कहा था किस ने कि शाख़-ए-नहीफ़ से फूटें

आफ़ताब इक़बाल शमीम

इश्क़ में ये मजबूरी तो हो जाती है

आफ़ताब इक़बाल शमीम

दिल और दुनिया दोनों को ख़ुश रखने में

आफ़ताब इक़बाल शमीम

ज़रा जो फ़ुर्सत-ए-नज़्ज़ारगी मयस्सर हो

आफ़ताब हुसैन

ये सोच कर भी तो उस से निबाह हो न सका

आफ़ताब हुसैन

ये दिल की राह चमकती थी आइने की तरह

आफ़ताब हुसैन

वो यूँ मिला था कि जैसे कभी न बिछड़ेगा

आफ़ताब हुसैन

वो शोर होता है ख़्वाबों में 'आफ़्ताब' 'हुसैन'

आफ़ताब हुसैन

वो सर से पाँव तक है ग़ज़ब से भरा हुआ

आफ़ताब हुसैन

वक़्त की वहशी हवा क्या क्या उड़ा कर ले गई

आफ़ताब हुसैन

तिरे बदन के गुलिस्ताँ की याद आती है

आफ़ताब हुसैन

सो अपने हाथ से दीं भी गया है दुनिया भी

आफ़ताब हुसैन

पते की बात भी मुँह से निकल ही जाती है

आफ़ताब हुसैन

मिलता है आदमी ही मुझे हर मक़ाम पर

आफ़ताब हुसैन

लोग किस किस तरह से ज़िंदा हैं

आफ़ताब हुसैन

क्या ख़बर मेरे ही सीने में पड़ी सोती हो

आफ़ताब हुसैन

कुछ रब्त-ए-ख़ास अस्ल का ज़ाहिर के साथ है

आफ़ताब हुसैन

कुछ और तरह की मुश्किल में डालने के लिए

आफ़ताब हुसैन

किसी तरह तो घटे दिल की बे-क़रारी भी

आफ़ताब हुसैन

किन मंज़रों में मुझ को महकना था 'आफ़्ताब'

आफ़ताब हुसैन