Couplets Poetry (page 586)
शिकस्त-ए-ज़िंदगी वैसे भी मौत ही है ना
अफ़ज़ल ख़ान
सज़ा-ए-मौत पे फ़रियाद से तो बेहतर है
अफ़ज़ल ख़ान
साथियो अब मुझे रस्ते में उतरना होगा
अफ़ज़ल ख़ान
परिंदे लड़ ही पड़े जाएदाद पर आख़िर
अफ़ज़ल ख़ान
नहीं था ध्यान कोई तोड़ते हुए सिगरेट
अफ़ज़ल ख़ान
मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी
अफ़ज़ल ख़ान
मैं ख़ुद भी यार तुझे भूलने के हक़ में हूँ
अफ़ज़ल ख़ान
लोगों ने आराम किया और छुट्टी पूरी की
अफ़ज़ल ख़ान
किसी ने ख़्वाब में आकर मुझे ये हुक्म दिया
अफ़ज़ल ख़ान
जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
अफ़ज़ल ख़ान
इतनी सारी यादों के होते भी जब दिल में
अफ़ज़ल ख़ान
इसी लिए हमें एहसास-ए-जुर्म है शायद
अफ़ज़ल ख़ान
हमारे साँस भी ले कर न बच सके अफ़ज़ल
अफ़ज़ल ख़ान
हमारा दिल ज़रा उकता गया था घर में रह रह कर
अफ़ज़ल ख़ान
इक वडेरा कुछ मवेशी ले के बैठा है यहाँ
अफ़ज़ल ख़ान
डुबो रहा है मुझे डूबने का ख़ौफ़ अब तक
अफ़ज़ल ख़ान
दालान में सब्ज़ा है न तालाब में पानी
अफ़ज़ल ख़ान
छोड़ कर मुझ को तिरे सहन मैं जा बैठा है
अफ़ज़ल ख़ान
बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो
अफ़ज़ल ख़ान
भाव ताओ में कमी बेशी नहीं हो सकती
अफ़ज़ल ख़ान
बना रक्खी हैं दीवारों पे तस्वीरें परिंदों की
अफ़ज़ल ख़ान
अब जो पत्थर है आदमी था कभी
अफ़ज़ल ख़ान
ये कैसे ख़्वाब की ख़्वाहिश में घर से निकला हूँ
अफ़ज़ल गौहर राव
यहाँ भला कौन अपनी मर्ज़ी से जी रहा है
अफ़ज़ल गौहर राव
तुम्हें ही सहरा सँभालने की पड़ी हुई है
अफ़ज़ल गौहर राव
तू परिंदों की तरह उड़ने की ख़्वाहिश छोड़ दे
अफ़ज़ल गौहर राव
मिरी तो आँख मिरा ख़्वाब टूटने से खुली
अफ़ज़ल गौहर राव
मिरी नज़र तो ख़लाओं ने बाँध रक्खी थी
अफ़ज़ल गौहर राव
मैं एक इश्क़ में नाकाम क्या हुआ 'गौहर'
अफ़ज़ल गौहर राव
क्या मुसीबत है कि हर दिन की मशक़्क़त के एवज़
अफ़ज़ल गौहर राव