Couplets Poetry (page 592)

कटी हुई है ज़मीं कोह से समुंदर तक

अदीम हाशमी

जो मह ओ साल गुज़ारे हैं बिछड़ कर हम ने

अदीम हाशमी

हम बहर हाल दिल ओ जाँ से तुम्हारे होते

अदीम हाशमी

हुआ है जो सदा उस को नसीबों का लिखा समझा

अदीम हाशमी

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था

अदीम हाशमी

इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा

अदीम हाशमी

बिकता तो नहीं हूँ न मिरे दाम बहुत हैं

अदीम हाशमी

बिछड़ के तुझ से न देखा गया किसी का मिलाप

अदीम हाशमी

यही महर ओ माह ओ अंजुम को गिला है मुझ से या-रब

अदीब सहारनपुरी

राहत की जुस्तुजू में ख़ुशी की तलाश में

अदीब सहारनपुरी

मंज़िलें न भूलेंगे राह-रौ भटकने से

अदीब सहारनपुरी

हज़ार बार इरादा किए बग़ैर भी हम

अदीब सहारनपुरी

बाँध कर अहद-ए-वफ़ा कोई गया है मुझ से

अदीब सहारनपुरी

अपने अपने हौसलों अपनी तलब की बात है

अदीब सहारनपुरी

वर्ना इंसान मर गया होता

अदा जाफ़री

तू ने मिज़्गाँ उठा के देखा भी

अदा जाफ़री

न बहलावा न समझौता जुदाई सी जुदाई है

अदा जाफ़री

मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ

अदा जाफ़री

लोग बे-मेहर न होते होंगे

अदा जाफ़री

कोई ताइर इधर नहीं आता

अदा जाफ़री

ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई

अदा जाफ़री

कटता कहाँ तवील था रातों का सिलसिला

अदा जाफ़री

काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या

अदा जाफ़री

जो दिल में थी निगाह सी निगाह में किरन सी थी

अदा जाफ़री

जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा

अदा जाफ़री

जिस की जानिब 'अदा' नज़र न उठी

अदा जाफ़री

जिस की बातों के फ़साने लिक्खे

अदा जाफ़री

होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए

अदा जाफ़री

हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है

अदा जाफ़री

गुल पर क्या कुछ बीत गई है

अदा जाफ़री