Couplets Poetry (page 594)
रह-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा भी कूचा-ओ-बाज़ार हो जैसे
अबु मोहम्मद सहर
फिर खुले इब्तिदा-ए-इश्क़ के बाब
अबु मोहम्मद सहर
मर्ज़ी ख़ुदा की क्या है कोई जानता नहीं
अबु मोहम्मद सहर
इश्क़ को हुस्न के अतवार से क्या निस्बत है
अबु मोहम्मद सहर
इश्क़ के मज़मूँ थे जिन में वो रिसाले क्या हुए
अबु मोहम्मद सहर
होश-मंदी से जहाँ बात न बनती हो 'सहर'
अबु मोहम्मद सहर
हिन्दू से पूछिए न मुसलमाँ से पूछिए
अबु मोहम्मद सहर
हमें तन्हाइयों में यूँ तो क्या क्या याद आता है
अबु मोहम्मद सहर
ग़म-ए-हबीब नहीं कुछ ग़म-ए-जहाँ से अलग
अबु मोहम्मद सहर
बे-रब्ती-ए-हयात का मंज़र भी देख ले
अबु मोहम्मद सहर
बर्क़ से खेलने तूफ़ान पे हँसने वाले
अबु मोहम्मद सहर
बला-ए-जाँ थी जो बज़्म-ए-तमाशा छोड़ दी मैं ने
अबु मोहम्मद सहर
वक़्त-ए-रुख़्सत भीगती पलकों का मंज़र याद है
अबसार अब्दुल अली
अपने दिल में आप ही रहता है वो
अबसार अब्दुल अली
यूँ 'आबरू' बनावे दिल में हज़ार बातें
आबरू शाह मुबारक
यारो हमारा हाल सजन सीं बयाँ करो
आबरू शाह मुबारक
वस्ल की अर्ज़ का जब वक़्त कभी पाता हूँ
आबरू शाह मुबारक
उस वक़्त जान प्यारे हम पावते हैं जी सा
आबरू शाह मुबारक
उस वक़्त दिल पे क्यूँके कहूँ क्या गुज़र गया
आबरू शाह मुबारक
तुम्हारी देख कर ये ख़ुश-ख़िरामी आब-रफ़्तारी
आबरू शाह मुबारक
तुम्हारे लोग कहते हैं कमर है
आबरू शाह मुबारक
तुम्हारे दिल में क्या ना-मेहरबानी आ गई ज़ालिम
आबरू शाह मुबारक
तुम्हारे देखने के वास्ते मरते हैं हम खल सीं
आबरू शाह मुबारक
तुम यूँ सियाह-चश्म ऐ सजन मुखड़े के झुमकों से हुए
आबरू शाह मुबारक
तुम नज़र क्यूँ चुराए जाते हो
आबरू शाह मुबारक
तुझ हुस्न के बाग़ में सिरीजन
आबरू शाह मुबारक
तिरे रुख़सारा-ए-सीमीं पे मारा ज़ुल्फ़ ने कुंडल
आबरू शाह मुबारक
तिरा क़द सर्व सीं ख़ूबी में चढ़ है
आबरू शाह मुबारक
तिरा हर उज़्व प्यारे ख़ुश-नुमा है उज़्व-ए-दीगर सीं
आबरू शाह मुबारक
तवाफ़-ए-काबा-ए-दिल कर नियाज़-ओ-ख़ाकसारी सीं
आबरू शाह मुबारक