Couplets Poetry (page 596)

इश्क़ का तीर दिल में लागा है

आबरू शाह मुबारक

हुआ है हिन्द के सब्ज़ों का आशिक़

आबरू शाह मुबारक

हो गए हैं पैर सारे तिफ़्ल-ए-अश्क

आबरू शाह मुबारक

ग़म सीं अहल-ए-बैत के जी तो तिरा कुढ़ता नहीं

आबरू शाह मुबारक

ग़म से हम सूख जब हुए लकड़ी

आबरू शाह मुबारक

ग़म के पीछो रास्त कहते हैं कि शादी होवे है

आबरू शाह मुबारक

फ़ानी-ए-इश्क़ कूँ तहक़ीक़ कि हस्ती है कुफ़्र

आबरू शाह मुबारक

इक अर्ज़ सब सीं छुप कर करनी है हम कूँ तुम सीं

आबरू शाह मुबारक

दूर ख़ामोश बैठा रहता हूँ

आबरू शाह मुबारक

दिवाने दिल कूँ मेरे शहर सें हरगिज़ नहीं बनती

आबरू शाह मुबारक

दिल्ली में दर्द-ए-दिल कूँ कोई पूछता नहीं

आबरू शाह मुबारक

दिलदार की गली में मुकर्रर गए हैं हम

आबरू शाह मुबारक

दिल कब आवारगी को भूला है

आबरू शाह मुबारक

दिखाई ख़्वाब में दी थी टुक इक मुँह की झलक हम कूँ

आबरू शाह मुबारक

डर ख़ुदा सीं ख़ूब नईं ये वक़्त-ए-क़त्ल-ए-आम कूँ

आबरू शाह मुबारक

दाग़ सीं क्यूँ न दिल उजाला हो

आबरू शाह मुबारक

ब्यारे तिरे नयन कूँ आहू कहे जो कोई

आबरू शाह मुबारक

बोसे में होंट उल्टा आशिक़ का काट खाया

आबरू शाह मुबारक

बोसाँ लबाँ सीं देने कहा कह के फिर गया

आबरू शाह मुबारक

ऐ सर्द-मेहर तुझ सीं ख़ूबाँ जहाँ के काँपे

आबरू शाह मुबारक

अगर देखे तुम्हारी ज़ुल्फ़ ले डस

आबरू शाह मुबारक

अफ़्सोस है कि बख़्त हमारा उलट गया

आबरू शाह मुबारक

अब दीन हुआ ज़माना-साज़ी

आबरू शाह मुबारक

आज यारों को मुबारक हो कि सुब्ह-ए-ईद है

आबरू शाह मुबारक

आग़ोश सीं सजन के हमन कूँ किया कनार

आबरू शाह मुबारक

वसवसे दिल में न रख ख़ौफ़-ए-रसन ले के न चल

अबरार किरतपुरी

कहीं भी राह-नुमा अब नज़र नहीं आता

अबरार किरतपुरी

हर इक इंसान के आमाल भी यकसाँ नहीं होते

अबरार किरतपुरी

ग़म से निस्बत है जिन्हें ज़ब्त-ए-अलम करते हैं

अबरार किरतपुरी

तमाम रात वो पहलू को गर्म करता रहा

अबरार आज़मी