Couplets Poetry (page 598)

यज़ीद-ए-वक़्त ने अब के लगाई है क़दग़न

आबिद वदूद

तिरे हाथों में है तिरी क़िस्मत

आबिद वदूद

शहर ये सायों का है इस में बनी-आदम कहाँ

आबिद वदूद

सर पर गिरे मकान का मलबा ही रख लिया

आबिद वदूद

सब अपने अपने तरीक़े से भीक माँगते हैं

आबिद वदूद

मैं बारिशों में बहुत भीगता रहा 'आबिद'

आबिद वदूद

मगर ये तीरगी जाने का नाम लेती नहीं

आबिद वदूद

कोई मंज़र भी नहीं अच्छा लगा

आबिद वदूद

इस ए'तिबार पे काटी है हम ने उम्र-ए-अज़ीज़

आबिद वदूद

हम किसी सुल्ताँ के ताबे नहीं 'आबिद-वदूद'

आबिद वदूद

हम फ़क़ीरों का पैरहन है धूप

आबिद वदूद

अब क़फ़स और गुलिस्ताँ में कोई फ़र्क़ नहीं

आबिद वदूद

यहाँ वहाँ हैं कई ख़्वाब जगमगाते हुए

आबिद सयाल

कफ़-ए-ख़िज़ाँ पे खिला मैं इस ए'तिबार के साथ

आबिद सयाल

उस के डर ही से मैं मोहज़्ज़ब हूँ

आबिद सिद्दीक़

ये आज कौन सी तक़्सीर हो गई 'नामी'

आबिद नामी

दम के दम में दुनिया बदली भीड़ छटी कोहराम उठा

आबिद नामी

क्यूँ न अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे इतराती हवा

आबिद मुनावरी

ज़ख़्म और पेड़ ने इक साथ दुआ माँगी है

आबिद मलिक

ये मोहब्बत कोई अंजान सी शय होती थी

आबिद मलिक

सब मुझे ढूँडने निकले हैं बुझा कर आँखें

आबिद मलिक

पूछता फिरता हूँ मैं अपना पता जंगल से

आबिद मलिक

निकाल लाए हैं सब लोग उस के अक्स में नक़्स

आबिद मलिक

मियाँ ये इश्क़ तो सब टूट कर ही करते हैं

आबिद मलिक

हज़ार ताने सुनेगा ख़जिल नहीं होगा

आबिद मलिक

फ़लक से कैसे मिरा ग़म दिखाई देगा तुझे

आबिद मलिक

बड़े सुकून से अफ़्सुर्दगी में रहता हूँ

आबिद मलिक

अभी से इस में शबाहत मिरी झलकने लगी

आबिद मलिक

ख़मोश रहने की आदत भी मार देती है

आबिद ख़ुर्शीद

ये जो हम तख़्लीक़-ए-जहान-ए-नौ में लगे हैं पागल हैं

अभिषेक शुक्ला