Couplets Poetry (page 600)
जफ़ा के ज़िक्र पे वो बद-हवास कैसा है
अब्दुस्समद ’तपिश’
हवा-ए-तुंद कैसी चल पड़ी है
अब्दुस्समद ’तपिश’
अब निशाना उस की अपनी ज़ात है
अब्दुस्समद ’तपिश’
अपनी नामूस की आती है हिफ़ाज़त जिन को
अब्दुश्शुकूर आसी
ज़ुल्मतें वहशत-ए-फ़र्दा से निढाल
अब्दुर रऊफ़ उरूज
ज़िंदगी अज़्मत-ए-हाज़िर के बग़ैर
अब्दुर रऊफ़ उरूज
ये तबस्सुम का उजाला ये निगाहों की सहर
अब्दुर रऊफ़ उरूज
नफ़स के लोच को ख़ंजर बनाना चाहती है
अब्दुर रऊफ़ उरूज
ख़मोशी मेरी लय में गुनगुनाना चाहती है
अब्दुर रऊफ़ उरूज
वो सो रहा है ख़ुदा दूर आसमानों में
अब्दुर्रहीम नश्तर
वो अजनबी तिरी बाँहों में जो रहा शब भर
अब्दुर्रहीम नश्तर
उस ने चलते चलते लफ़्ज़ों का ज़हराब
अब्दुर्रहीम नश्तर
फटे पुराने बदन से किसे ख़रीद सकूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
पत्थर ने पुकारा था मैं आवाज़ की धुन में
अब्दुर्रहीम नश्तर
मैं तेरी चाह में झूटा हवस में सच्चा हूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
मैं भी तालाब का ठहरा हुआ पानी था कभी
अब्दुर्रहीम नश्तर
देख रहा था जाते जाते हसरत से
अब्दुर्रहीम नश्तर
अपनी ही ज़ात के सहरा में सुलगते हुए लोग
अब्दुर्रहीम नश्तर
आवाज़ दे रहा है अकेला ख़ुदा मुझे
अब्दुर्रहीम नश्तर
गुलचीं बहार-ए-गुल में न कर मन-ए-सैर-ए-बाग़
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
वो क़यामत थी कि रेज़ा रेज़ा हो के उड़ गया
अब्दुल्लाह कमाल
तुम तो ऐ ख़ुशबू हवाओ उस से मिल कर आ गईं
अब्दुल्लाह कमाल
मैं तुझ को जागती आँखों से छू सकूँ न कभी
अब्दुल्लाह कमाल
इक मुसलसल जंग थी ख़ुद से कि हम ज़िंदा हैं आज
अब्दुल्लाह कमाल
चमक दे चाँद को ठंडक हवा को दिल को उमंग
अब्दुल्लाह कमाल
अपने वजूद से परे अब
अब्दुल्लाह कमाल
अभी गुनाह का मौसम है आ शबाब में आ
अब्दुल्लाह कमाल
आओ आज हम दोनों अपना अपना घर चुन लें
अब्दुल्लाह कमाल
ज़मीं को और ऊँचा मत उठाओ
अब्दुल्लाह जावेद
यक़ीं का दाएरा देखा है किस ने
अब्दुल्लाह जावेद