Couplets Poetry (page 601)

तुम अपने अक्स में क्या देखते हो

अब्दुल्लाह जावेद

तर्क करनी थी हर इक रस्म-ए-जहाँ

अब्दुल्लाह जावेद

शाइरी पेट की ख़ातिर 'जावेद'

अब्दुल्लाह जावेद

सजाते हो बदन बेकार 'जावेद'

अब्दुल्लाह जावेद

साहिल पे लोग यूँही खड़े देखते रहे

अब्दुल्लाह जावेद

फिर नई हिजरत कोई दरपेश है

अब्दुल्लाह जावेद

मंज़रों के भी परे हैं मंज़र

अब्दुल्लाह जावेद

कभी सोचा है मिट्टी के अलावा

अब्दुल्लाह जावेद

जब थी मंज़िल नज़र में तो रस्ता था एक

अब्दुल्लाह जावेद

इस ही बुनियाद पर क्यूँ न मिल जाएँ हम

अब्दुल्लाह जावेद

हर इक रस्ते पे चल कर सोचते हैं

अब्दुल्लाह जावेद

देखते हम भी हैं कुछ ख़्वाब मगर हाए रे दिल

अब्दुल्लाह जावेद

अश्क ढलते नहीं देखे जाते

अब्दुल्लाह जावेद

आप के जाते ही हम को लग गई आवारगी

अब्दुल्लाह जावेद

रक़ीबान-ए-सियह-रू शहर-ए-देहली के मुसाहिब हैं

अब्दुल वहाब यकरू

प्यासा मत जला साक़ी मुझे गर्मी सीं हिज्राँ की

अब्दुल वहाब यकरू

न होवे क्यूँ के गर्दूं पे सदा दिल की बुलंद अपनी

अब्दुल वहाब यकरू

ख़म-ए-मेहराब-ए-अबरुवाँ के बीच

अब्दुल वहाब यकरू

कमाँ अबरू निपट शह-ज़ोर हैगा

अब्दुल वहाब यकरू

जो तूँ मुर्ग़ा नहीं है ऐ ज़ाहिद

अब्दुल वहाब यकरू

जिगर में ल'अल के आतिश पड़ी है

अब्दुल वहाब यकरू

जने देखा सो ही बौरा हुआ है

अब्दुल वहाब यकरू

जब कि पहरा है तीं लिबास ज़र्रीं

अब्दुल वहाब यकरू

इश्क़ के फ़न नीं हूँ मैं अवधूत

अब्दुल वहाब यकरू

इश्क़ का तिफ़्ल गिर ज़मीं ऊपर

अब्दुल वहाब यकरू

शेर कहने की तबीअत न रही

अब्दुल सलाम

जो ये हिन्दोस्ताँ नहीं होता

अब्दुल सलाम

दिल की हालत बयाँ नहीं होती

अब्दुल सलाम

यारा है कहाँ इतना कि उस यार को यारो

अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

याद तो हक़ की तुझे याद है पर याद रहे

अब्दुल रहमान एहसान देहलवी