Couplets Poetry (page 599)

ये जो दुनिया है इसे इतनी इजाज़त कब है

अभिषेक शुक्ला

ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में

अभिषेक शुक्ला

वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था

अभिषेक शुक्ला

वहाँ पहले ही आवाज़ें बहुत थीं

अभिषेक शुक्ला

उस से कहना की धुआँ देखने लाएक़ होगा

अभिषेक शुक्ला

तेरी आँखों के लिए इतनी सज़ा काफ़ी है

अभिषेक शुक्ला

शब भर इक आवाज़ बनाई सुब्ह हुई तो चीख़ पड़े

अभिषेक शुक्ला

सफ़र के बाद भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए

अभिषेक शुक्ला

मक़ाम-ए-वस्ल तो अर्ज़-ओ-समा के बीच में है

अभिषेक शुक्ला

मैं सोचता हूँ बहुत ज़िंदगी के बारे में

अभिषेक शुक्ला

मैं चोट कर तो रहा हूँ हवा के माथे पर

अभिषेक शुक्ला

कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है

अभिषेक शुक्ला

हमीं जहान के पीछे पड़े रहें कब तक

अभिषेक शुक्ला

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अबीर अबुज़री

अभी तो तुझे एक फेंटी लगी है

अबीर अबुज़री

ये मैं हूँ ख़ुद कि कोई और है तआक़ुब में

अब्दुस्समद ’तपिश’

वो बड़ा था फिर भी वो इस क़दर बे-फ़ैज़ था

अब्दुस्समद ’तपिश’

वक़्त के दामन में कोई

अब्दुस्समद ’तपिश’

वही क़ातिल वही मुंसिफ़ बना है

अब्दुस्समद ’तपिश’

उसे खिलौनों से बढ़ कर है फ़िक्र रोटी की

अब्दुस्समद ’तपिश’

उन के लब पर मिरा गिला ही सही

अब्दुस्समद ’तपिश’

सब को दिखलाता है वो छोटा बना कर मुझ को

अब्दुस्समद ’तपिश’

न जाने कौन फ़ज़ाओं में ज़हर घोल गया

अब्दुस्समद ’तपिश’

मैं ने जो कुछ भी लिक्खा है

अब्दुस्समद ’तपिश’

मैं भी तन्हा इस तरफ़ हूँ वो भी तन्हा उस तरफ़

अब्दुस्समद ’तपिश’

क्यूँ वो मिलने से गुरेज़ाँ इस क़दर होने लगे

अब्दुस्समद ’तपिश’

कुछ हक़ाएक़ के ज़िंदा पैकर हैं

अब्दुस्समद ’तपिश’

कोई कॉलम नहीं है हादसों पर

अब्दुस्समद ’तपिश’

कौन पत्थर उठाए

अब्दुस्समद ’तपिश’

जहाँ तक पाँव मेरे जा सके हैं

अब्दुस्समद ’तपिश’