Couplets Poetry (page 597)
शायद तुम्हारी याद मिरे पास आ गई
अबरार आज़मी
परिंदे फ़ज़ाओं में फिर खो गए
अबरार आज़मी
मुझे भी फ़ुर्सत-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल न थी
अबरार आज़मी
मैं ने कल तोड़ा इक आईना तो महसूस हुआ
अबरार आज़मी
ख़ुशनुमा दीवार-ओ-दर के ख़्वाब ही देखा किए
अबरार आज़मी
कमरे में धुआँ दर्द की पहचान बना था
अबरार आज़मी
चेहरों के मैले जिस्मों के जंगल थे हर जगह
अबरार आज़मी
आवाज़ों का बोझ उठाए सदियों से
अबरार आज़मी
यूँ ही निमटा दिया है जिस को तू ने
अबरार अहमद
ये ऊँट और किसी के हैं दश्त मेरा है
अबरार अहमद
ये दाग़-ए-इश्क़ जो मिटता भी है चमकता भी है
अबरार अहमद
याद भी तेरी मिट गई दिल से
अबरार अहमद
तू कहीं बैठ और हुक्म चला
अबरार अहमद
क़िस्से से तिरे मेरी कहानी से ज़ियादा
अबरार अहमद
मरकज़-ए-जाँ तो वही तू है मगर तेरे सिवा
अबरार अहमद
मैं ठहरता गया रफ़्ता रफ़्ता
अबरार अहमद
कि जैसे कुंज-ए-चमन से सबा निकलती है
अबरार अहमद
कहीं कोई चराग़ जलता है
अबरार अहमद
कभी तो ऐसा है जैसे कहीं पे कुछ भी नहीं
अबरार अहमद
जो भी यकजा है बिखरता नज़र आता है मुझे
अबरार अहमद
जिस काम में हम ने हाथ डाला
अबरार अहमद
हम यक़ीनन यहाँ नहीं होंगे
अबरार अहमद
हम अपनी राह पकड़ते हैं देखते भी नहीं
अबरार अहमद
हर रुख़ है कहीं अपने ख़द-ओ-ख़ाल से बाहर
अबरार अहमद
गुंजाइश-ए-अफ़्सोस निकल आती है हर रोज़
अबरार अहमद
गो फ़रामोशी की तकमील हुआ चाहती है
अबरार अहमद
फ़िराक़ ओ वस्ल से हट कर कोई रिश्ता हमारा है
अबरार अहमद
ढंग के एक ठिकाने के लिए
अबरार अहमद
भर लाए हैं हम आँख में रखने को मुक़ाबिल
अबरार अहमद
सोचता हूँ कुछ अमल करता हूँ कुछ
अबरार आबिद