Couplets Poetry (page 595)
शेर को मज़मून सेती क़द्र हो है 'आबरू'
आबरू शाह मुबारक
साथ मेरे तेरे जो दुख था सो प्यारे ऐश था
आबरू शाह मुबारक
सर कूँ अपने क़दम बना कर के
आबरू शाह मुबारक
रोवने नीं मुझ दिवाने के किया सियानों का काम
आबरू शाह मुबारक
क़ौल 'आबरू' का था कि न जाऊँगा उस गली
आबरू शाह मुबारक
क़द सर्व चश्म नर्गिस रुख़ गुल दहान ग़ुंचा
आबरू शाह मुबारक
फिरते थे दश्त दश्त दिवाने किधर गए
आबरू शाह मुबारक
नमकीं गोया कबाब हैं फीके शराब के
आबरू शाह मुबारक
मुफ़्लिसी सीं अब ज़माने का रहा कुछ हाल नईं
आबरू शाह मुबारक
मिल गया था बाग़ में माशूक़ इक नक-दार सा
आबरू शाह मुबारक
मिल गईं आपस में दो नज़रें इक आलम हो गया
आबरू शाह मुबारक
मेहराब-ए-अबरुवाँ कूँ वसमा हुआ है ज़ेवर
आबरू शाह मुबारक
मालूम अब हुआ है आ हिन्द बीच हम कूँ
आबरू शाह मुबारक
मैं निबल तन्हा न इस दुनिया की सोहबत सीं हुआ
आबरू शाह मुबारक
क्यूँ तिरी थोड़ी सी गर्मी सीं पिघल जावे है जाँ
आबरू शाह मुबारक
क्यूँ न आ कर उस के सुनने को करें सब यार भीड़
आबरू शाह मुबारक
क्यूँ मलामत इस क़दर करते हो बे-हासिल है ये
आबरू शाह मुबारक
क्यूँ कर बड़ा न जाने मुंकिर नपे को अपने
आबरू शाह मुबारक
क्या सबब तेरे बदन के गर्म होने का सजन
आबरू शाह मुबारक
किया है चाक दिल तेग़-ए-तग़ाफ़ुल सीं तुझ अँखियों नीं
आबरू शाह मुबारक
ख़ुदावंदा करम कर फ़ज़्ल कर अहवाल पर मेरे
आबरू शाह मुबारक
ख़ुद अपनी आदमी को बड़ी क़ैद-ए-सख़्त है
आबरू शाह मुबारक
कम मत गिनो ये बख़्त-सियाहों का रंग-ए-ज़र्द
आबरू शाह मुबारक
कभी बे-दाम ठहरावें कभी ज़ंजीर करते हैं
आबरू शाह मुबारक
जो कि बिस्मिल्लाह कर खाए तआम
आबरू शाह मुबारक
जंगल के बीच वहशत घर में जफ़ा ओ कुल्फ़त
आबरू शाह मुबारक
जलता है अब तलक तिरी ज़ुल्फ़ों के रश्क से
आबरू शाह मुबारक
जब सीं तिरे मुलाएम गालों में दिल धँसा है
आबरू शाह मुबारक
जब कि ऐसा हो गंदुमी माशूक़
आबरू शाह मुबारक
इश्क़ की सफ़ मनीं नमाज़ी सब
आबरू शाह मुबारक