Couplets Poetry (page 603)
फ़िलफ़िल-ए-ख़ाल-ए-मलाहत के तसव्वुर में तिरे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
एक बोसे से मुराद-ए-दिल-ए-नाशाद तो दो
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
दिल-रुबा तुझ सा जो दिल लेने में अय्यारी करे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
दिल में तुम हो न जलाओ मिरे दिल को देखो
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
डर अपने पीर से बी पीर पीर पीर न कर
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
चश्म-ए-मस्त उस की याद आने लगी
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ब-वक़्त-ए-बोसा-ए-लब काश ये दिल कामराँ होता
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
अपनी ना-फ़हमी से मैं और न कुछ कर बैठूँ
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
अँधेरी रात को मैं रोज़-ए-इश्क़ समझा था
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
अनार-ए-ख़ुल्द को तू रख कि मैं पसंद नहीं
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
अगर बैठा ही नासेह मुँह को सी बैठ
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
आँखें मिरी फूटें तिरी आँखों के बग़ैर आह
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
आह-ए-पेचाँ अपनी ऐसी है कि जिस के पेच को
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
आग इस दिल-लगी को लग जाए
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
था किसी गुम-कर्दा-ए-मंज़िल का नक़्श-ए-बे-सबात
अब्दुल रहमान बज़्मी
छलक जाती है अश्क-ए-गर्म बन कर मेरी आँखों से
अब्दुल रहमान बज़्मी
अबस ढूँडा किए हम ना-ख़ुदाओं को सफ़ीनों में
अब्दुल रहमान बज़्मी
सू-ए-सहरा ही चलें शायद रहें महफ़ूज़ कुछ
अब्दुल मन्नान तरज़ी
इल्तिफ़ात-ए-दोस्ताँ भी ज़लज़ला से कम नहीं
अब्दुल मन्नान तरज़ी
तुझे कुछ इश्क़ ओ उल्फ़त के सिवा भी याद है ऐ दिल
अब्दुल मजीद सालिक
नई शमएँ जलाओ आशिक़ी की अंजुमन वालो
अब्दुल मजीद सालिक
मिरे दिल में है कि पूछूँ कभी मुर्शिद-ए-मुग़ाँ से
अब्दुल मजीद सालिक
जो उन्हें वफ़ा की सूझी तो न ज़ीस्त ने वफ़ा की
अब्दुल मजीद सालिक
इश्क़ है बे-गुदाज़ क्यूँ हुस्न है बे-नियाज़ क्यूँ
अब्दुल मजीद सालिक
हमारे डूबने के बाद उभरेंगे नए तारे
अब्दुल मजीद सालिक
हाल-ए-दिल सुन के वो आज़ुर्दा हैं शायद उन को
अब्दुल मजीद सालिक
हाल-ए-दिल सुन के वो आज़ुर्दा हैं शायद उन को
अब्दुल मजीद सालिक
चराग़-ए-ज़िंदगी होगा फ़रोज़ाँ हम नहीं होंगे
अब्दुल मजीद सालिक
अब नहीं जन्नत मशाम-ए-कूचा-ए-यार की शमीम
अब्दुल मजीद सालिक
ये शबाब-ए-हुस्न ये हुस्न-ए-शबाब
अब्दुल मजीद हैरत