Couplets Poetry (page 607)
ये क़ैद है तो रिहाई भी अब ज़रूरी है
अब्दुल हमीद
उतरे थे मैदान में सब कुछ ठीक करेंगे
अब्दुल हमीद
पाँव रुकते ही नहीं ज़ेहन ठहरता ही नहीं
अब्दुल हमीद
लोगों ने बहुत चाहा अपना सा बना डालें
अब्दुल हमीद
लौट गए सब सोच के घर में कोई नहीं है
अब्दुल हमीद
फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं
अब्दुल हमीद
एक मिश्अल थी बुझा दी उस ने
अब्दुल हमीद
दूर बस्ती पे है धुआँ कब से
अब्दुल हमीद
दिन गुज़रते हैं गुज़रते ही चले जाते हैं
अब्दुल हमीद
दम-ब-दम मुझ पे चला कर तलवार
अब्दुल हमीद
बरसते थे बादल धुआँ फैलता था अजब चार जानिब
अब्दुल हमीद
ये हाथ राख में ख़्वाबों की डालते तो हो
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
तुम्हारे संग-ए-तग़ाफ़ुल का क्यूँ करें शिकवा
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
सज्दे के हर निशाँ पे है ख़ूँ सा जमा हुआ
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
सदा किसे दें 'नईमी' किसे दिखाएँ ज़ख़्म
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
मिरे ख़्वाबों की चिकनी सीढ़ियों पर
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
मिरे ख़ुलूस पे शक की तो कोई वज्ह नहीं
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
माज़ी के रेग-ज़ार पे रखना सँभल के पाँव
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
मैं भी इस सफ़्हा-ए-हस्ती पे उभर सकता हूँ
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
खड़ा हुआ हूँ सर-ए-राह मुंतज़िर कब से
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
हुस्न इक दरिया है सहरा भी हैं उस की राह में
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
ज़ाहिरन मौत है क़ज़ा है इश्क़
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
उन के दिल की कुदूरत और बढ़ी
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
पीरी में शौक़ हौसला-फ़रसा नहीं रहा
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
मस्जिद में गर गुज़र न हुआ दैर ही सही
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
हर बात है 'ख़ालिद' की ज़माने से निराली
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
और भी कितने तरीक़े हैं बयान-ए-ग़म के
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
ज़माने सब्ज़ ओ सुर्ख़ ओ ज़र्द गुज़रे
अब्दुल अहद साज़
यादों के नक़्श घुल गए तेज़ाब-ए-वक़्त में
अब्दुल अहद साज़
वो तो ऐसा भी है वैसा भी है कैसा है मगर?
अब्दुल अहद साज़