Couplets Poetry (page 92)
बनाएँगे नई दुनिया हम अपनी
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
बहुत कम बोलना अब कर दिया है
शम्स तबरेज़ी
फ़ज़ा में उड़ते परिंदे की ख़ैर हो यारब
शम्स रम्ज़ी
डूबता हुआ सूरज दे गया सज़ा ऐसी
शम्स रम्ज़ी
बे-ज़बाँ भी तो बता देता है मंज़िल का पता
शम्स रम्ज़ी
तमाम शहर ब-यक-वक़्त जल गया कैसे
शमीम तारिक़
क़बीला-वार अदावत का सिलसिला 'तारिक़'
शमीम तारिक़
मुझे हर शाम इक सुनसान जंगल खींच लेता है
शमीम रविश
इक शख़्स तेरी बज़्म से ख़ामोश उठ गया
शमीम रविश
शहर में अम्न-ओ-अमाँ हो ये ज़रूरी है मगर
शमीम क़ासमी
मूए ने मुँह की खाई फिर भी ये ज़ोर ज़ोरी
शमीम क़ासमी
घर में आसेब ज़लज़ले का है
शमीम क़ासमी
पीने को इस जहान में कौन सी मय नहीं मगर
शमीम करहानी
लीजिए बुला लिया आप को ख़याल में
शमीम करहानी
चुप हूँ तुम्हारा दर्द-ए-मोहब्बत लिए हुए
शमीम करहानी
बुझा है दिल तो न समझो कि बुझ गया ग़म भी
शमीम करहानी
बे-ख़बर फूल को भी खींच के पत्थर पे न मार
शमीम करहानी
मिरी ख़ुशी से मिरे दोस्तों को ग़म है 'शमीम'
शमीम जयपुरी
दुनिया है कि गोशा-ए-जहन्नम
शमीम जयपुरी
बहुत तवील शब-ए-ग़म है क्या किया जाए
शमीम जयपुरी
वो एक शोर सा ज़िंदाँ में रात-भर क्या था
शमीम हनफ़ी
तमाम उम्र नए लफ़्ज़ की तलाश रही
शमीम हनफ़ी
शाम ने बर्फ़ पहन रक्खी थी रौशनियाँ भी ठंडी थीं
शमीम हनफ़ी
मैं ने चाहा था कि लफ़्ज़ों में छुपा लूँ ख़ुद को
शमीम हनफ़ी
बंद कर के खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख
शमीम हनफ़ी
हसीन रुत है मगर कौन घर से निकलेगा
शमीम फ़ारूक़ी
दूर तक फैला हुआ है एक अन-जाना सा ख़ौफ़
शमीम फ़ारूक़ी
याद आती है अच्छी सी कोई बात सर-ए-शाम
शमीम अब्बास
टटोलो परख लो चलो आज़मा लो
शमीम अब्बास
साल, पर साल, और फिर इस साल
शमीम अब्बास