Couplets Poetry (page 90)
ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है
शारिक़ कैफ़ी
कौन था वो जिस ने ये हाल किया है मेरा
शारिक़ कैफ़ी
कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था
शारिक़ कैफ़ी
कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए
शारिक़ कैफ़ी
कैसे टुकड़ों में उसे कर लूँ क़ुबूल
शारिक़ कैफ़ी
कहाँ सोचा था मैं ने बज़्म-आराई से पहले
शारिक़ कैफ़ी
कभी ख़ुद को छू कर नहीं देखता हूँ
शारिक़ कैफ़ी
जिन पर मैं थोड़ा सा भी आसान हुआ हूँ
शारिक़ कैफ़ी
झूट पर उस के भरोसा कर लिया
शारिक़ कैफ़ी
जैसे ये मेज़ मिट्टी का हाथी ये फूल
शारिक़ कैफ़ी
हो सबब कुछ भी मिरे आँख बचाने का मगर
शारिक़ कैफ़ी
हैं अब इस फ़िक्र में डूबे हुए हम
शारिक़ कैफ़ी
गुफ़्तुगू कर के परेशाँ हूँ कि लहजे में तिरे
शारिक़ कैफ़ी
फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ
शारिक़ कैफ़ी
फ़ैसले औरों के करता हूँ
शारिक़ कैफ़ी
एक दिन हम अचानक बड़े हो गए
शारिक़ कैफ़ी
बीनाई भी क्या क्या धोके देती है
शारिक़ कैफ़ी
भीड़ में जब तक रहते हैं जोशीले हैं
शारिक़ कैफ़ी
बहुत हिम्मत का है ये काम 'शारिक़'
शारिक़ कैफ़ी
बहुत हसीं रात है मगर तुम तो सो रहे हो
शारिक़ कैफ़ी
बहुत गदला था पानी उस नदी का
शारिक़ कैफ़ी
बहुत भटके तो हम समझे हैं ये बात
शारिक़ कैफ़ी
अजब लहजे में करते थे दर ओ दीवार बातें
शारिक़ कैफ़ी
अचानक हड़बड़ा कर नींद से मैं जाग उट्ठा हूँ
शारिक़ कैफ़ी
अभी तो अच्छी लगेगी कुछ दिन जुदाई की रुत
शारिक़ कैफ़ी
अब मुझे कौन जीत सकता है
शारिक़ कैफ़ी
आओ गले मिल कर ये देखें
शारिक़ कैफ़ी
न यही कि ज़ौक़-ए-नज़र मिरा सफ़-ए-गुल-रुख़ाँ से गुज़र गया
शारिक़ ईरायानी
कहीं दाम-ए-सब्ज़ा-ए-गुल मिला कहीं आरज़ू का चमन खिला
शारिक़ ईरायानी
तू जून की गर्मी से न घबरा कि जहाँ में
शरीफ़ कुंजाही