Couplets Poetry (page 91)
तवील रात भी आख़िर को ख़त्म होती है
शरीफ़ कुंजाही
ख़ंदा-ए-मौज मिरी तिश्ना-लबी ने जाना
शरीफ़ कुंजाही
गुलज़ार में वो रुत भी कभी आ के रहेगी
शरीफ़ कुंजाही
ग़ुनूदा राहों को तक तक के सोगवार न हो
शरीफ़ कुंजाही
बस्तियाँ तू ने ख़लाओं में बसाईं भी तो क्या
शरीफ़ कुंजाही
सरों पे ओढ़ के मज़दूर धूप की चादर
शारिब मौरान्वी
पेड़ के नीचे ज़रा सी छाँव जो उस को मिली
शारिब मौरान्वी
किसी को मार के ख़ुश हो रहे हैं दहशत-गर्द
शारिब मौरान्वी
उश्शाक़ के आगे न लड़ा ग़ैरों से आँखें
शरफ़ मुजद्दिदी
तेरी आँखें जिसे चाहें उसे अपना कर लें
शरफ़ मुजद्दिदी
तसव्वुर ने तिरे आबाद जब से घर किया मेरा
शरफ़ मुजद्दिदी
तमाम चारागरों से तो मिल चुका है जवाब
शरफ़ मुजद्दिदी
शैख़ कुछ अपने-आप को समझें
शरफ़ मुजद्दिदी
क़दमों पे गिरा तो हट के बोले
शरफ़ मुजद्दिदी
पारसा बन के सू-ए-मय-ख़ाना
शरफ़ मुजद्दिदी
पामालियों का ज़ीना है अर्श से भी ऊँचा
शरफ़ मुजद्दिदी
कम-सिनी जिन की हमें याद है और कल की ही बात
शरफ़ मुजद्दिदी
जिस को चाहा तू ने उस को मिल गया
शरफ़ मुजद्दिदी
जी में आता है कि फूलों की उड़ा दूँ ख़ुशबू
शरफ़ मुजद्दिदी
इस पर्दे में ये हुस्न का आलम है इलाही
शरफ़ मुजद्दिदी
इंतिहा-ए-मअरिफ़त से ऐ 'शरफ़'
शरफ़ मुजद्दिदी
हज़रत-ए-नासेह भी मय पीने लगे
शरफ़ मुजद्दिदी
हैरत में हूँ इलाही क्यूँ-कर ये ख़त्म होगा
शरफ़ मुजद्दिदी
एक को एक नहीं रश्क से मरने देता
शरफ़ मुजद्दिदी
दुख़्त-ए-रज़ ज़ाहिद से बोली मुझ से घबराते हो क्यूँ
शरफ़ मुजद्दिदी
दुख़्त-ए-रज़ और तू कहाँ मिलती
शरफ़ मुजद्दिदी
दिल में मिरे जिगर में मिरे आँख में मिरी
शरफ़ मुजद्दिदी
अल्लाह अल्लाह ख़ुसूसिय्यत-ए-ज़ात-ए-हसनैन
शरफ़ मुजद्दिदी
अब तो मय-ख़ानों से भी कुछ बढ़ कर
शरफ़ मुजद्दिदी
आलम-ए-इश्क़ में अल्लाह-रे नज़र की वुसअत
शरफ़ मुजद्दिदी