Couplets Poetry (page 89)
हाए उस मिन्नत-कश-ए-वहम-ओ-गुमाँ की जुस्तुजू
शौकत परदेसी
देता रहा फ़रेब-ए-मुसलसल कोई मगर
शौकत परदेसी
बर्क़ की शो'ला-मिज़ाजी है मुसल्लम लेकिन
शौकत परदेसी
अपने पराए थक गए कह कर हर कोशिश बेकार रही
शौकत परदेसी
ऐ इंक़लाब-ए-नौ तिरी रफ़्तार देख कर
शौकत परदेसी
अहद-ए-आग़ाज़-ए-तमन्ना भी मुझे याद नहीं
शौकत परदेसी
अगर तुम जल भी जाते तो न होता ख़त्म अफ़्साना
शौकत परदेसी
अधूरा हो के हूँ कितना मुकम्मल
शौकत परदेसी
यही कमरा था जिस में चैन से हम जी रहे थे
शारिक़ कैफ़ी
वो बस्ती ना-ख़ुदाओं की थी लेकिन
शारिक़ कैफ़ी
वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता
शारिक़ कैफ़ी
उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे
शारिक़ कैफ़ी
तसल्ली अब हुई कुछ दिल को मेरे
शारिक़ कैफ़ी
शायद उसे ज़रूरत हो अब पर्दे की
शारिक़ कैफ़ी
सारी दुनिया से लड़े जिस के लिए
शारिक़ कैफ़ी
सब आसान हुआ जाता है
शारिक़ कैफ़ी
रुका महफ़िल में इतनी देर तक मैं
शारिक़ कैफ़ी
रात थी जब तुम्हारा शहर आया
शारिक़ कैफ़ी
क़ुर्ब का उस के उठा कर फ़ाएदा
शारिक़ कैफ़ी
पता नहीं ये तमन्ना-ए-क़ुर्ब कब जागी
शारिक़ कैफ़ी
पहली बार वो ख़त लिक्खा था
शारिक़ कैफ़ी
नींद के वास्ते वैसे भी ज़रूरी है थकन
शारिक़ कैफ़ी
नया यूँ है कि अन-देखा है सब कुछ
शारिक़ कैफ़ी
मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली
शारिक़ कैफ़ी
मंज़िलों पर हम मिलें ये तय हुआ
शारिक़ कैफ़ी
मैं किसी दूसरे पहलू से उसे क्यूँ सोचूँ
शारिक़ कैफ़ी
लरज़ते काँपते हाथों से बूढ़ा
शारिक़ कैफ़ी
क्या मिला दश्त में आ कर तिरे दीवाने को
शारिक़ कैफ़ी
किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक
शारिक़ कैफ़ी
किस एहसास-ए-जुर्म की सब करते हैं तवक़्क़ो
शारिक़ कैफ़ी