Couplets Poetry (page 87)

गली के मोड़ से घर तक अँधेरा क्यूँ है 'निज़ाम'

शीन काफ़ निज़ाम

एक आसेब है हर इक घर में

शीन काफ़ निज़ाम

दोस्ती इश्क़ और वफ़ादारी

शीन काफ़ निज़ाम

धूल उड़ती है धूप बैठी है

शीन काफ़ निज़ाम

दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे

शीन काफ़ निज़ाम

चुभन ये पीठ में कैसी है मुड़ के देख तो ले

शीन काफ़ निज़ाम

बीच का बढ़ता हुआ हर फ़ासला ले जाएगा

शीन काफ़ निज़ाम

बरसों से घूमता है इसी तरह रात दिन

शीन काफ़ निज़ाम

बदलती रुत का नौहा सुन रहा है

शीन काफ़ निज़ाम

अपनी पहचान भीड़ में खो कर

शीन काफ़ निज़ाम

अपने अफ़्साने की शोहरत उसे मंज़ूर न थी

शीन काफ़ निज़ाम

आरज़ू थी एक दिन तुझ से मिलूँ

शीन काफ़ निज़ाम

आँखें कहीं दिमाग़ कहीं दस्त ओ पा कहीं

शीन काफ़ निज़ाम

ज़िंदगी हम से तिरे नाज़ उठाए न गए

शाज़ तमकनत

उस का होना भी भरी बज़्म में है वज्ह-ए-सुकूँ

शाज़ तमकनत

उन से मिलते थे तो सब कहते थे क्यूँ मिलते हो

शाज़ तमकनत

सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है

शाज़ तमकनत

शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है

शाज़ तमकनत

मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए

शाज़ तमकनत

कोई तो आ के रुला दे कि हँस रहा हूँ मैं

शाज़ तमकनत

किताब-ए-हुस्न है तू मिल खुली किताब की तरह

शाज़ तमकनत

कभी ज़ियादा कभी कम रहा है आँखों में

शाज़ तमकनत

एक रात आप ने उम्मीद पे क्या रक्खा है

शाज़ तमकनत

आगे आगे कोई मिशअल सी लिए चलता था

शाज़ तमकनत

इतरा के आईना में चिढ़ाते थे अपना मुँह

शौक़ क़िदवाई

हर मुल्क इस के आगे झुकता है एहतिरामन

शौक़ बहराइची

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था

शौक़ बहराइची

'शौकत' हमारे साथ बड़ा हादिसा हुआ

शाैकत वास्ती

रविश रविश पे चमन के बुझे बुझे मंज़र

शाैकत वास्ती

मुझे तो रंज क़बा-ए-हा-ए-तार-तार का है

शाैकत वास्ती